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Who Am I, Main kaun hoon, what is soul | मैं कौन हूं मेरी पहचान क्या है? | आत्मा का रहस्य क्या है

आइए आज जीवन के प्रथम अध्याय के बारे में जानते हैं आज हम चर्चा करेंगे स्वंम की पहचान क्या है और खुद का खुद से परिचय कराएंगे| चलो तो पहले कुछ प्रश्न लेते हैं कि जब कभी हमारे चारो तरफ अशांति होती है, शोर होता है , तो क्यों हमारी यह चाहना होती है की यहाँ शांति हो जाये ? जब हम कहीं पर जायदा दुःख देखते हैं तो क्यों अंदर आता है कि दुःख दूर हो जाये सब सुखी हो? जब कहीं पर गंदगी देखते हैं तो बोलते है छी छी, चाहना होती सब शुद्ध, स्वच्छ और पवित्र हो जाये? क्योंकि हकीकत यही है हमारा स्वरुप ही है शांतिप्रिय, प्रेममय, आनंदमय, सुखी तभी तो हमरी बार बार चाहना होती है शांति, सुख, प्रेम इत्यादि अपने गुणों की|
 

 Who I am

 

मैं कौन हूं मेरी पहचान क्या है? (Who Am I)

तो आइये स्वंम को जानते हैं हम कौन हैं, क्या पहचान है, क्या गुणधर्म है हमारे| सबसे पहले हम एक बात लेते हैं कि हमे जब कोई रोग या परेशानी होती है तब हम बोलते हैं कि मेरे सर में दर्द है, पेट में दर्द है, मेरे हाथ से या मेरे सरीर से कार्य नहीं करा जा रहा है, हम ऐसा क्यों नहीं बोलते की मैं सर दर्द कर रहा है, मैं पेट दर्द कर रहा है, क्यों? क्योंकि मैं जो हूँ और वो इस सरीर से अलग हूँ, मैं इस सरीर की मालिक हूँ, मैं वह शक्ति हूँ जिससे यह सरीर सारे कार्य करता है, मैं वह चैतन्य शक्ति आत्मा हूँ|

what is soul? (आत्मा का रहस्य क्या है?)

आइये अब एक साधारण से उद्धरण से जान लेते हैं की, मैं (चैतन्य शक्ति) और इस सरीर में क्या अंतर है, एक गाड़ी है, और एक ड्राइवर है, गाड़ी का भोजन अलग है, और ड्राइवर का भोजन अलग है, गाड़ी पेट्रोल, डीजल, cng, इत्यादि से चलती है, और ड्राइवर दाल-रोटी इत्यादि चीजे खाकर जीवित रहता है, लेकिन क्या बिना ड्राइवर के गाड़ी चल सकती है, बिना ड्राइवर या किसी अन्य उपकरण की सहायता से वह हिल भी नहीं सकती, उसके लिए किसी इंसान की जरुरत पड़ेगी, उसी तरह हमारे सरीर यानि की गाड़ी, और ड्राइवर यानि की आत्मा वह चैतन्य शक्ति जो इस सरीर को चलाने का कार्य करती है, जैसे गाड़ी ड्राइवर के बिना नहीं चल सकती ऐसे ही सरीर भी आत्मा के बिना हिल भी नहीं सकता, तभी तो आत्मा के बिना सरीर सिर्फ पांच तत्वों का बना पुतला कहलाता है, आत्मा से ही सरीर में प्राण हैं, बिना आत्मा के हमारा यह सरीर मृत ही समान पड़ता है|

जैसे गाड़ी और ड्राइवर का भोजन अलग है वैसे ही हमारे सरीर और हमारी आत्मा का भोजन भी अलग होगा ना, क्या गाड़ी रोटी-चावल, से चल सकती है, या सरीर पेट्रोल डीजल से चल सकता है नहीं ना, इसी प्रकार आत्मा और सरीर का भोजन भी अलग है, सरीर का भोजन है रोटी-चावल इत्यादि हैं और हमारी आत्मा की क्या चाहना है, जैसे की पहले बताया है आत्मा के वो सात गुण ही उसका भोजन हुआ, शांति, प्रेम, आनंद, ज्ञान, पवित्रता, सुख, शक्ति इत्यादि, सरीर को तो हम अच्छा स्वादिस्ट भोजन देते हैं, लेकिन क्या हम अपनी आत्मा को आज के समय में सही भोजन दे पा रहे हैं, जरा सी बात पर हमे क्रोध आ जाता है, दुसरो से ईर्ष्या करते है, प्रेम की भी कितनी कमी है, क्योंकि हम अपने सरीर की तो अच्छी देखभाल कर रहे हैं, लेकिन आत्मा की सही देखभाल नहीं कर पा रहे है|


जो लोग नहीं मानते की आत्मा होती है, या नहीं, तो अब विज्ञानं ने भी साबित कर दिया है कि आत्मा होती है, या नहीं तो अब विज्ञानं ने भी साबित कर लिया की आत्मा होती है आत्मा का अस्थाई निवास स्थान हमारी दोनों भृकुटियों के मध्य जहाँ हम टिका लगाते हैं, वही पर माना जाता है, विज्ञानं के अनुसार आत्मा एक बिंदु के रूप में दोनों भृकुयो के मध्य से 2.५ इंच पीछे और ऊपर से 1.५ निचे स्थित होती है, लेकिन सरफेस मार्किंग दोनों भृकुटियों के मध्य ही दर्शाते हैं, आत्मा एक एक छोटी बिंदु रुप में चमकती हुई ज्योति स्वरुप होती है, इसीलिए जब कोई देहधारी अपना सरीर त्याग कर देता है तो ज्योत जलाई जाती है,
आत्मा में गुणधर्मो के बारे मैं जानते हैं जैसे सभी चीज़ो के कुछ गुण और दोष होते हैं| 

ऐसे ही आत्मा के मुख्या सात गुणधर्म हैं: 

1. आनंद 

2. ज्ञान

3. शांति

4. प्रेम

5. सुख

6. पवित्रता

7. शक्ति


हमारी आत्मा अजर, अमर, अविनासी  है, आत्मा  इस सरीर की आँखों से नहीं दिखती, आत्मा अविनासी है तो उसका कोई विनास भी नहीं कर सकता ना वो कटती, जलती है, परन्तु यह सरीर जल, कट सकता है, सरीर त्याग देने के बाद आत्मा अपने कार्ये के लिए दूसरा सरीर ले लेती है, वह अमर है आत्मा के सात गुण जो उसके स्वरूप है इसी कारन हमारी चाहना होती है सुख, शांति, प्रेम इत्यादि प्राप्त करने की, जब एक बच्चा जनम लेता है, तो वो कितना पवित्र, सुद्ध, निर्विकारी होता लकिन संसार में आकर वो विकारी हो जाता है, ऐसे ही आत्मा जब परमधाम मे होती है तो बिलकुल पवित्र, शांत, निर्विकारी होती है, इस संसार मे आकर विकारी हो जाती है इस संसार मे जब हम स्वयं को आत्मा न देखकर इसे सरीर समजने लगते है तो बुद्धि में विकार उत्त्पन होते है जिन्हे रावण राज्य कहा जाता है, जैसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार इत्यादि भी भयानक होते है, इस संसार में आकर हम अपना असली रूप भूलकर इन विकारो को अपना लेते है, और सरीर में रोग, दुसरो से कष्ट पाते है, जैसे सरीर को कार्य करने क लिए पांच केंद्रीयो की आवयसकता है, ऐसे ही आत्मा भी हमारे मन, बुद्धि और संस्कार के माध्यम से इस सरीर में कार्य करती है, जैसा हम मन मे सोचेंगे वैसे हमारी बुद्धि मे ख्याल आएंगे, और वैसे ही फिर हमारा कार्य होगा, इसलिए सबसे पहले हमे अपने मन को काबू में करना चाहिए, जो चीज़े हमारे लिए सही है उपयोगी है वही देखे उन्ही के बारे में सोचे उन्ही के प्रति मन में ख्याल आएंगे और फिर कार्य भी सही कर पाएंगे, इसलिए अपने को पहचानो की तुम कौन हो तुम अजर, अमर, अविनाशी आत्मा हो, यह सरीर विकारी हो सकता है पर आत्मा के सात गुणों मे ही हमे रहना है, हम शांति प्रिये होंगे, तो सुखी होंगे, तो प्रेममय हो जायेंगे, और पवित्र रहेंगे तो ज्ञान, आनंद भी हमारे पास आ जायेगा, हमे काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार इत्यादि विकारों से दूर रहना है यह हमारे महाशत्रु है.


हमे स्वंम और सभी अन्य देहधारियों को आत्मा स्वरुप में समझना चाहिए और सभी को जो हमारे सात गुण है उन्ही गुणों से देखना चाहिए तभी हम शांतिमय और सुखी जीवन जी सकेंगे. अपने सात गुणों की पहचान करे उन्हें जायदा से जायदा अपने भीतर धारण करे और एक खुशाल जीवन जिए|

 

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