राजस्थान की पावन धरा हमेशा से ही संतों, सूरवीरों और अद्भुत लोक देव-देवियों की भूमि रही है। इसी पवित्र पावन धरती पर मां करणी के अवतार के रूप में श्री इंद्र बाईसा का जन्म हुआ था जिन्होंने अपने चमत्कारों और असीम दया से लाखों लोगों का जीवन बदल दिया। खुड़द धाम में उनका मुख्य थान स्थापित है जहां आज भी देश-विदेश से श्रद्धालु अपनी मन्नतें लेकर आते हैं। माता इंद्र बाईसा की विशेष कृपा और सुरक्षा कवच पाने के लिए श्री इंद्र बाईसा चालीसा का पाठ करना सबसे उत्तम और सरल उपाय माना गया है। आज के समय में जब लोग शारीरिक कष्टों, कोर्ट-कचहरी के मामलों और अनजाने डरों से परेशान रहते हैं, तब इंद्र बाईसा का सुमरन जीवन में एक नई उम्मीद जगाता है।
मान्यता है कि साल 2012 के मार्गशीर्ष महीने में महाप्रयाण करने वाली माता इंद्र बाईसा आज भी सूक्ष्म रूप में अपने भक्तों की हर पुकार सुनती हैं। अगर कोई भी भक्त अपने घर के मंदिर में बैठकर सच्चे भाव से इस चालीसा का गान करता है, तो उसके घर की सारी नकारात्मक शक्तियां हमेशा के लिए भाग जाती हैं। श्री इंद्र बाईसा चालीसा पाठ में माता के दिव्य स्वरूप, उनके मरदनी कोट-साफे वाले पहनावे और उनके जीवन के महान परचों का सुंदर वर्णन किया गया है। सागर दान जी और धापू बाई के घर जन्मी इंद्र कुमारी बचपन से ही शक्ति का रूप थीं और दिन में तीन बार अपने हाथों से जोत किया करती थीं।
इस चालीसा का पाठ करने से भक्तों को माता के उसी ममतामयी और रक्षक रूप का अहसास होता है जो अपने सेवकों के लिए हमेशा दौड़ी चली आती हैं। इस पावन पाठ की भाषा इतनी सरल और ठेठ देसी अंदाज में है कि इसे कोई भी आम इंसान बहुत आसानी से गुनगुना सकता है। जहां बहुत कठिन तांत्रिक विधियों या मंत्रों के जाप में कड़े नियमों की जरूरत होती है, वहीं इस चालीसा को आप बिना किसी तामझाम के अपने घर में पढ़ सकते हैं। यह चालीसा इंसान के मन को एक गहरी शांति देती है और पूरे परिवार को हर तरह की बुरी नजर और तंत्र-मंत्र के बुरे असर से बचाकर रखती है।
|| श्री इंद्र बाईसा चालीसा (Indra Baisa Chalisa PDF) ||
॥ दोहा ॥
नमो नमो गज बदन ने, रिद्ध-सिद्ध के भंडार।
नमो सरस्वती शारदा, माँ करणी अवतार ॥
इन्द्र बाईसा आपरो, खुड़द धाम बड़ खम्भ।
संकट मेटो सेवगा, शरण पड़या भुज लम्ब ॥
॥ चौपाई ॥
आवड़जी अरु राजा बाई। और देशाणे करणी माई ॥
चौथो अवतार खुड़द में लीनो। चारण कुल उज्जवल कर दीहो ॥
सागर दान पिता बड़ भागी। धापू बाई की कोख उजागी ॥
बचपन में आंगनिये मांही। थान थरपियो पूजा तांई ॥
दिन में तीन बार निज हाथा। करती ज्योत सवाई माता ॥
जिन-जिन सेवा कीनी तन सूं। परचा पाया तिन बचपन सूं ॥
गेंढा, गाँव खुड़द के पासा। गुमान सिंह तहं करतो वासा ॥
चारण जाति पर तेज करतो। इन्द्र कुमारी पर व्यंग कसतो ॥
इन्द्र कुमारी ना शक्ति मानूं। गढ़ में आ जावे तब जानूं ॥
एक दिवस गेंढे गढ़ मांही। इन्द्र कुंवरसा पहुँचा जाई ॥
गुमान सिंह हो बड़ो गुमानी। बाईसा री कदर न जाणी ॥
बोल्यो मौत बता कद म्हांरी। शक्ति पिछाणूं म्हे जद थारी ॥
नवमे दिन नव लाख जोगणी। भक्षण करसी आय यक्षिणी ॥
तिरस्कार देवी रो कीन्हो। नवमे दिन चील्हाँ चुग लीन्हो ॥
निमराणा री राज कुमारी। पंगु पांगली अति दुःखियारी ॥
इन्द्र बाईसा रे शरणे आई। दुःख हर लीन्हो पीड़ मिटाई ॥
नापासर बीकाणें मांही। सेठाणी एक हीरां बाई ॥
ज़न्म जात की पंगु बेचारी। खुड़द बुलाय लई महतारी ॥
पंगु पन्ना लाल महाजन। घणी दवाई की, खरच्यो धन ॥
चौबीस मास खुड़द में खटकर। की देवी री सेवा डटकर ॥
खुश होया सेवा सूं बाई। महाजन रो सब व्यथा मिटाई ॥
दुःख हरणी सुख करणी माई। भक्त हितां तूं दौड़ी आई ॥
ध्यावे राजा राव औ रंका। मिटा ध्यावता ही सब शंका ॥
बांझ ध्याय पुत्र फल पावे। रोगी सुमरे रोग नशावे ॥
पगा पांगला ने पग देवे। इन्द्र बाईसा ने जब सेवे ॥
तन-मन सूं कोई ध्यान लगावे। दुःख-दरिद्र सारा मिट जावे ॥
माथे पर माँ साफो साजे। स्वर्ण जटित छुरंगों साजे ॥
कानों में जग मोती बाला। गल सोहे रतना री माला ॥
स्वर्ण गले करणी री मूरत। है मरदानी माँ री सूरत ॥
बन्द गले रो कोट सुहावे। रूप देखकर मन हरसावे ॥
सूरज सी लिलाड़ी दमके। खड़ग हाथ में थारे चमके ॥
इन्द्र बाईसा करनल रूपा। रूप आपरो अकथ अनूपा ॥
माथे पर सोहे मद बिन्दू। खमा खुड़द री अम्बे इन्दू ॥
हाथ राख ज्यों हे भुज लम्बे। शक्ति इन्द्र कुंवरसा अम्बे ॥
घणी खमा खुड़दाने वाली। पांगलियाँ पग देने वाली ॥
जो कोई जस इन्द्रा रा गावे। निश्चय वह सुख सम्पंत्ति पावे ॥
डर डाकर नेड़ा नहीं आवे। कोर्ट कचेरी इज्जत पावे ॥
इन्द्र चालीसा जो कोई गावे। पग उभराणी अम्बे आवे ॥
हनुमान ध्वावे जगदम्बा। मात करो नहीं और विलम्बा ॥
॥ दोहा ॥
दो हजार बारह मिति, मिगसर मास प्रमाण।
कृष्ण पक्ष द्वितीय गुरु, प्रातज तजिया प्राण ॥
इन्द्र बाईसा खुड़द में, करण बसी देसाण।
जिन ध्याया तिन पाइया, नत मस्तक हनुमान ॥
श्री इंद्र बाईसा चालीसा पाठ के लाभ
पूरी निष्ठा और अटूट विश्वास के साथ माता इंद्र बाईसा की चालीसा का गान करने से भक्तों को अपने जीवन में बहुत ही सुखद और चमत्कारी बदलाव देखने को मिलते हैं। माता अपने भक्तों की सच्ची भक्ति से बहुत जल्दी खुश हो जाती हैं और उनकी झोली खुशियों से भर देती हैं।
यदि कोई भी व्यक्ति पूरी श्रद्धा के साथ इस पवित्र चालीसा को अपनी दैनिक पूजा का हिस्सा बनाता है, तो उसे निम्नलिखित मुख्य लाभ और पुण्य फल प्राप्त होते हैं:
- इस चालीसा में साफ बताया गया है कि निमराणा की राजकुमारी और नापासर बीकानेर की हीरां बाई जैसी गंभीर रूप से पंगु और बीमार महिलाओं का कष्ट माता ने पल भर में दूर कर दिया था। जो लोग पुरानी बीमारियों से परेशान हैं, उन्हें इस पाठ से अद्भुत स्वास्थ्य लाभ मिलता है।
- अगर आपके ऊपर कोई झूठा मुकदमा चल रहा है या आप सरकारी दफ्तरों और अदालतों के चक्कर काटकर थक चुके हैं, तो इस चालीसा का पाठ करें। माता इंद्र बाईसा की दया से आपको समाज में इज्जत मिलती है और फैसला आपके पक्ष में आने लगता है।
- जो लोग अक्सर रात में डर जाते हैं या जिन्हें लगता है कि उनके घर में कोई नेगेटिव एनर्जी है, उनके लिए यह पाठ एक अचूक सुरक्षा कवच है। इस चालीसा के बजते ही भूत-प्रेत और डर कभी भी आपके नजदीक नहीं फटक सकते।
- जिन दंपतियों को संतान प्राप्ति में लगातार बाधाएं आ रही हैं, वे अगर सच्चे मन से माता का ध्यान करें तो उन्हें बहुत जल्दी सुंदर संतान का सुख मिलता है। साथ ही घर की घोर कंगाली दूर होती है और धन-धान्य की बरकत बनी रहती है।
- चालीसा की पंक्तियों के अनुसार जो व्यक्ति माता के खुड़द धाम का ध्यान करके इस पाठ को करता है, उसके जीवन के बड़े से बड़े संकट और रुके हुए काम बहुत ही आसानी से और समय पर पूरे हो जाते हैं।
श्री इंद्र बाईसा चालीसा पाठ की सही विधि
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, किसी भी पाठ का पूरा पुण्य फल तभी मिलता है जब उसे सही नियमों और शुद्ध मन के साथ किया जाए। माता इंद्र बाईसा की पूजा में सादगी और सच्ची श्रद्धा का सबसे बड़ा महत्व माना गया है क्योंकि मां केवल भाव की भूखी हैं। सही तरीके से किया गया पाठ हमेशा उत्तम और शीघ्र फल देने वाला साबित होता है।
अगर आप भी अपने जीवन के दुखों को दूर करने और माता इंद्र बाईसा का आशीर्वाद पाने के लिए इस चालीसा का पाठ करना चाहते हैं, तो इस सरल विधि का पालन करें:
- पाठ करने के लिए सुबह का समय सबसे उत्तम माना जाता है। सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त हो जाएं और पूरी तरह पवित्र होकर साफ कपड़े पहनें। इस पूजा में मन की शुद्धता सबसे जरूरी है।
- अपने घर के मंदिर को अच्छे से साफ कर लें। एक छोटी चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं और उस पर माता इंद्र बाईसा या मां करणी की तस्वीर स्थापित करें।
- माता की तस्वीर के सामने शुद्ध देसी घी का एक दीपक जलाएं और साथ में सुगंधित धूपबत्ती भी सुलगाएं। माता को कुंकुम, अक्षत और ताजे फूल श्रद्धापूर्वक अर्पित करें।
- माता इंद्र बाईसा को मिश्री, मखाने, पीले फल या फिर दूध से बनी सात्विक मिठाई का भोग लगाएं। भोग लगाने के बाद साफ जल का अर्घ्य भी जरूर दें।
- अब ऊन या कुशा के आसन पर बैठ जाएं और अपना मुख पूर्व या उत्तर दिशा की तरफ रखें। पूरी एकाग्रता के साथ श्री इंद्र बाईसा चालीसा का पाठ करें। पाठ पूरा होने के बाद माता की आरती करें और अपनी मनोकामना पूरी करने की प्रार्थना करें।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या महिलाएं भी इंद्र बाईसा चालीसा का पाठ कर सकती हैं?
हाँ, महिलाएं भी पूरी पवित्रता और सच्ची श्रद्धा के साथ माता इंद्र बाईसा की चालीसा का पाठ बहुत आराम से कर सकती हैं। बस इस बात का ध्यान रखें कि अशुद्ध दिनों या मासिक धर्म के दौरान इस पाठ को करने से पूरी तरह बचना चाहिए।
इस चालीसा का पाठ किस दिन से शुरू करना सबसे अच्छा होता है?
इस पवित्र चालीसा का पाठ शुरू करने के लिए मंगलवार या शुक्रवार का दिन सबसे उत्तम माना जाता है क्योंकि ये दिन शक्ति की पूजा के लिए विशेष हैं। इसके अलावा आप किसी भी शुभ तिथि या नवरात्रि के दिनों से भी इसे शुरू कर सकते हैं।
क्या शाम के समय भी इस चालीसा का पाठ किया जा सकता है?
हाँ, अगर आपको सुबह के समय किसी कारणवश फुर्सत नहीं मिल पाती है, तो आप शाम को सूर्यास्त के समय हाथ-पैर धोकर और साफ होकर मां के सामने घी का दीपक जलाकर इस चालीसा का पाठ बहुत ही शांत मन से कर सकते हैं।
पाठ के दौरान किस तरह के खान-पान का परहेज रखना चाहिए?
माता की साधना के दौरान सात्विकता का पालन करना बेहद जरूरी माना गया है। जितने दिन भी आप माता की चालीसा का नियमपूर्वक पाठ करते हैं, उतने दिन मांस, मदिरा और हर तरह के तामसिक भोजन से पूरी तरह दूरी बनाकर रखना चाहिए।
॥ इति श्री इन्द्र बाईसा चालीसा सम्पूर्ण ॥

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