हिंदू धर्म में शक्ति साधना का विशेष महत्व है, और जब बात ब्रह्मांड की सर्वोच्च चेतना यानी माता ललिता त्रिपुरसुन्दरी की हो, तो श्री ललिता सहस्रनाम को सर्वोत्तम ग्रंथ माना जाता है। यह केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि साक्षात मंत्रों का विज्ञान है।
ब्रह्मांड पुराण के उत्तर खंड में भगवान हयग्रीव और महर्षि अगस्त्य के संवाद के रूप में प्रकट हुआ श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्रम् पाठ मां भगवती की कृपा प्राप्त करने का सबसे अचूक साधन है। इसमें माता के 1000 पवित्र नामों का वर्णन है, जिनमें से कोई भी नाम दोबारा नहीं दोहराया गया है। आइए जानते हैं इस अद्भुत पाठ के गूढ़ रहस्य, इसके चमत्कारी लाभ और इसे करने की सबसे सटीक विधि।
वशिन्यादिवाग्देवता ऋषयः ।
अनुष्टुप्छन्दः ।
श्रीललितापरमेश्वरी देवता ।
श्रीमद्वाग्भवकूटेति बीजम् ।
मध्यकूटेति शक्तिः ।
शक्तिकूटेति कीलकम् ।
श्रीललितामहात्रिपुरसुन्दरी-प्रसादसिद्धिद्वारा
चिन्तितफलावाप्त्यर्थे जपे विनियोगः ।
तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् ।
पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं
सौम्यां रत्नघटस्थरक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ॥
अणिमादिभिरावृतां मयुखैः
अहमित्येव विभावये भवानीम् ॥
सर्वालङ्कारयुक्तां सततमभयदां भक्तनम्रां भवानीं
श्रीविद्यां शान्तमूर्तिं सकलसुरनुतां सर्वसम्पत्प्रदात्रीम् ॥
अशेषजनमोहिनीमरुणमाल्यभूषाम्बरां
जपाकुसुमभासुरां जपविधौ रेदम्बिकाम् ॥
॥ अथ श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्रम् ॥
रागस्वरूप-पाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला ॥
निजारुण-प्रभापूर-मज्जद्ब्रह्माण्ड-मण्डला ॥
कुरुविन्दमणि-श्रेणी-कनत्कोटीर-मण्डिता ॥
मुखचन्द्र-कलङ्काभ-मृगनाभि-विशेषका ॥
वक्त्रलक्ष्मी-परीवाह-चलन्मीनाभ-लोचना ॥
ताराकान्ति-तिरस्कारि-नासाभरण-भासुरा ॥
ताटङ्क-युगली-भूत-तपनोडुप-मण्डला ॥
नवविद्रुम-बिम्बश्री-न्यक्कारि-रदनच्छदा ॥
कर्पूर-वीटिकामोद-समाकर्षि-दिगन्तरा ॥
मन्दस्मित-प्रभापूर-मज्जत्कामेश-मानसा ॥
कामेश-बद्ध-माङ्गल्य-सूत्र-शोभित-कन्धरा ॥
रत्नग्रैवेय-चिन्ताक-लोल-मुक्ता-फलान्विता ॥
नाभ्यालवाल-रोमालि-लता-फल-कुचद्वयी ॥
स्तनभार-दलन्मध्य-पट्टबन्ध-वलित्रया ॥
रत्न-किङ्किणिका-रम्य-रशना-दाम-भूषिता ॥
माणिक्य-मुकुटाकार-जानुद्वय-विराजिता ॥
गूढगुल्फा कूर्मपृष्ठ-जयिष्णु-प्रपदान्विता ॥
पदद्वय-प्रभाजाल-पराकृत-सरोरुहा ॥
मराली-मन्दगमना महालावण्य-शेवधिः ॥
शिव-कामेश्वराङ्कस्था शिवा स्वाधीन-वल्लभा ॥
चिन्तामणि-गृहान्तस्था पञ्च-ब्रह्मासन-स्थिता ॥
सुधासागर-मध्यस्था कामाक्षी कामदायिनी ॥
भण्डासुर-वधोद्युक्त-शक्तिसेना-समन्विता ॥
अश्वारूढाधिष्ठिताश्व-कोटि-कोटिभिरावृता ॥
गेयचक्र-रथारूढ-मन्त्रिणी-परिसेविता ॥
ज्वाला-मालिनिकाक्षिप्त-वह्निप्राकार-मध्यगा ॥
नित्या-पराक्रमाटोप-निरीक्षण-समुत्सुका ॥
मन्त्रिण्यम्बा-विरचित-विषङ्ग-वध-तोषिता ॥
कामेश्वर-मुखालोक-कल्पित-श्रीगणेश्वरा ॥
भण्डासुरेन्द्र-निर्मुक्त-शस्त्र-प्रत्यस्त्र-वर्षिणी ॥
महा-पाशुपतास्त्राग्नि-निर्दग्धासुर-सैनिका ॥
ब्रह्मोपेन्द्र-महेन्द्रादि-देव-संस्तुत-वैभवा ॥
श्रीमद्वाग्भव-कूटैक-स्वरूप-मुख-पङ्कजा ॥
शक्ति-कूटैकतापन्न-कट्यधोभाग-धारिणी ॥
कुलामृतैक-रसिका कुलसंकेत-पालिनी ॥
अकुला समयान्तस्था समयाचार-तत्परा ॥ ३७॥
मणि-पूरान्तरुदिता विष्णुग्रन्थि-विभेदिनी ॥ ३८॥
सहस्राराम्बुजारूढा सुधा-साराभिवर्षिणी ॥ ३९॥
महासक्तिः कुण्डलिनी बिसतन्तु-तनीयसी ॥ ४०॥
भद्रप्रिया भद्रमूर्तिर्भक्त-सौभाग्यदायिनी ॥ ४१॥
शाम्भवी शारदाराध्या शर्वाणी शर्मदायिनी ॥ ४२॥
शातोदरी शान्तिमती निराधारा निरञ्जना ॥ ४३॥
निर्गुणा निष्कला शान्ता निष्कामा निरुपप्लवा ॥ ४४॥
नित्यशुद्धा nित्यबुद्धा निरवद्या निरन्तरा ॥ ४५॥
नीरागा रागमथनी निर्मदा मदनाशिनी ॥ ४६॥
निर्ममा ममताहन्त्री निष्पापा पापनाशिनी ॥ ४७॥
निःसंशया संशयघ्नी निर्भवा भवनाशिनी ॥ ४८॥
निर्नाशा मृत्युमथनी निष्क्रिया निष्परिग्रहा ॥ ४९॥
दुर्लभा दुर्गमा दुर्गा दुःखहन्त्री सुखप्रदा ॥ ५०॥
सर्वज्ञा सान्द्रकरुणा समानाधिक-वर्जिता ॥ ५१॥
सर्वेश्वरी सर्वमयी सर्वमन्त्र-स्वरूपिणी ॥ ५२॥
माहेश्वरी महादेवी महालक्ष्मीर्मृडप्रिया ॥ ५३॥
महामाया महासत्त्वा महाशक्तिर्महारतिः ॥ ५४॥
महाबुद्धिर्महासिद्धिर्महायोगेश्वरेश्वरी ॥ ५५॥
महायाग-क्रमाराध्या महाभैरव-पूजिता ॥ ५६॥
महाकामेश-महिषी महात्रिपुर-सुन्दरी ॥ ५७॥
महाचतुः-षष्टिकोटि-योगिनी-गणसेविता ॥ ५८॥
चारुरूपा चारुहासा चारुचन्द्र-कलाधरा ॥ ५९॥
पार्वती पद्मनयना पद्मराग-समप्रभा ॥ ६०॥
चिन्मयी परमानन्दा विज्ञान-घनरूपिणी ॥ ६१॥
विश्वरूपा जागरिणी स्वपन्ती तैजसात्मिका ॥ ६२॥
सृष्टिकर्त्री ब्रह्मरूपा गोप्त्री गोविन्दरूपिणी ॥ ६३॥
सदाशिवाऽनुग्रहदा पञ्चकृत्य-परायणा ॥ ६४॥
पद्मासना भगवती पद्मनाभ-सहोदरी ॥ ६५॥
सहस्र-शीर्षवदना सहस्राक्षी सहस्रपात् ॥ ६६॥
निजाज्ञारूप-निगमा पुण्यापुण्य-फलप्रदा ॥ ६७॥
सकलागम-सन्दोह-शुक्ति-सम्पुट-मौक्तिका ॥ ६८॥
अम्बिकाऽनादि-निधना हरिब्रह्मेन्द्र-सेविता ॥ ६९॥
ह्रींकारी ह्रीमती हृद्या हेयोपादेय-वर्जिता ॥ ७०॥
रञ्जनी रमणी रस्या रणत्किङ्किणि-मेखला ॥ ७१॥
रक्षाकरी राक्षसघ्नी रामा रमणलम्पटा ॥ ७२॥
कल्याणी जगतीकन्दा करुणा-रस-सागरा ॥ ७३॥
वरदा वामनयना वारुणी-मद-विह्वला ॥ ७४॥
विधात्री वेदजननी विष्णुमाया विलासिनी ॥ ७५॥
क्षयवृद्धि-विनिर्मुक्ता क्षेत्रपाल-समर्चिता ॥ ७६॥
वाग्वादिनी वामकेशी वह्निमण्डल-वासिनी ॥ ७७॥
संहृताशेष-पाषण्डा सदाचार-प्रवर्तिका ॥ ७८॥
तरुणी साराध्या तनुमध्या तमोऽपहा ॥ ७९॥
स्वात्मानन्द-लवीभूत-ब्रह्माद्यानन्द-सन्ततिः ॥ ८०॥
मध्यमा वैखरीरूपा भक्त-मानस-हंसिका ॥ ८१॥
शृङ्गार-रस-सम्पूर्णा जया जालन्धर-स्थिता ॥ ८२॥
रहोयाग-क्रमाराध्या रहस्तर्पण-तर्पिता ॥ ८३॥
षडङ्गदेवता-युक्ता षाड्गुण्य-परिपूरिता ॥ ८४॥
नित्या-षोडशिका-रूपा श्रीकण्ठार्ध-शरीरिणी ॥ ८५॥
मूलप्रकृतिरव्यक्ता व्यक्ताव्यक्त-स्वरूपिणी ॥ ८६॥
महाकामेश-नयन-कुमुदाह्लाद-कौमुदी ॥ ८७॥
शिवदूती शिवाराध्या शिवमूर्तिः शिवङ्करी ॥ ८८॥
अप्रमेया स्वप्रकाशा मनोवाचामगोचरा ॥ ८९॥
गायत्री व्याहृतिः सन्ध्या द्विजवृन्द-निषेविता ॥ ९०॥
निःसीम-महिमा नित्य-यौवना मदशालिनी ॥ ९१॥
चन्दन-द्रव-दिग्धाङ्गी चाम्पेय-कुसुम-प्रिया ॥ ९२॥
कुलकुण्डालया कौल-मार्ग-तत्पर-सेविता ॥ ९३॥
शान्तिः स्वस्तिमती कान्तिर्नन्दिनी विघ्ननाशिनी ॥ ९४॥
मालिनी हंसिनी माता मलयाचल-वासिनी ॥ ९५॥
कालकण्ठी कान्तिमती क्षोभिणी सूक्ष्मरूपिणी ॥ ९६॥
सिद्धेश्वरी सिद्धविद्या सिद्धमाता यशस्विनी ॥ ९७॥
खट्वाङ्गादि-प्रहरणा वदनैक-समन्विता ॥ ९८॥
अमृतादि-महाशक्ति-संवृता डाकिनीश्वरी ॥ ९९॥
दंष्ट्रोज्ज्वलाऽक्ष-मालादि-धरा रुधिरसंस्थिता ॥ १००॥
महावीरेन्द्र-वरदा राकिण्यम्बा-स्वरूपिणी ॥ १०१॥
वज्रादिकायुधोपेता डामर्यादिभिरावृता ॥ १०२॥
समस्तभक्त-सुखदा लाकिन्यम्बा-स्वरूपिणी ॥ १0३॥
शूलाद्यायुध-सम्पन्ना पीतवर्णाऽतिगर्विता ॥ १०४॥
दध्यन्नासक्त-हृदया काकिनी-रूप-धारिणी ॥ १०५॥
अङ्कुशादि-प्रहरणा वरदादि-निषेविता ॥ १०६॥
हरिद्रान्नैक-रसिका हाकिनी-रूप-धारिणी ॥ १०८॥
सर्वायुधधरा शुक्ल-संस्थिता सर्वतोमुखी ॥ १०९॥
स्वाहा स्वधाऽमतिर्मेधा श्रुतिः स्मृतिरनुत्तमा ॥ ११०॥
पुलोमजार्चिता बन्ध-मोचनी बन्धुरालका ॥ १११॥
सर्वव्याधि-प्रशमनी सर्वमृत्यु-निवारिणी ॥ ११२॥
कात्यायनी कालहन्त्री कमलाक्ष-निषेविता ॥ ११३॥
मृगाक्षी मोहिनी मुख्य्या मृडानी मित्ररूपिणी ॥ ११४॥
मैत्र्यादि-वासनालभ्या महाप्रलय-साक्षिणी ॥ ११५॥
माध्वीपानालसा मत्ता मातृका-वर्ण-रूपिणी ॥ ११६॥
महनीया दयामूर्तिर्महासाम्राज्य-शालिनी ॥ ११७॥
श्री-षोडशाक्षरी-विद्या त्रिकूटा कामकोटिका ॥ ११८॥
शिरःस्थिता चन्द्रनिभा भालस्थेन्द्र-धनुःप्रभा ॥ ११९॥
दाक्षायणी दैत्यहन्त्री दक्षयज्ञ-विनाशिनी ॥ १२०॥
गुरुमूर्तिर्गुणनिधिर्गोमाता गुहजन्मभूः ॥ १२१॥
प्रतिपन्मुख्य-राकान्त-तिथि-मण्डल-पूजिता ॥ १२२॥
सचामर-रमा-वाणी-सव्य-दक्षिण-सेविता ॥ १२३॥
अनेककोटि-ब्रह्माण्ड-जननी दिव्यविग्रहा ॥ १२४॥
त्रिपुरा त्रिजगद्वन्द्या त्रिमूर्तिस्त्रिदशेश्वरी ॥ १२५॥
उमा शैलेन्द्रतनया गौरी गन्धर्व-सेविता ॥ १२६॥
ध्यानगम्याऽपरिच्छेद्या ज्ञानदा ज्ञानविग्रहा ॥ १२७॥
लोपामुद्रार्चिता लीला-कॢप्त-ब्रह्माण्ड-मण्डला ॥ १२८॥
योगिनी योगदा योग्या योगानन्दा युगन्धरा ॥ १२९॥
सर्वाधारा सुप्रतिष्ठा सदसद्रूप-धारिणी ॥ १३०॥
एकाकिनी भूमरूपा निर्द्वैता द्वैतवर्जिता ॥ १३१॥
बृहती ब्राह्मणी ब्राह्मी ब्रह्मानन्दा बलिप्रिया ॥ १३२॥
सुखाराध्या शुभकरी शोभना सुलभा गतिः ॥ १३३॥
राजत्कृपा राजपीठ-निवेशित-निजाश्रिता ॥ १३४॥
साम्राज्य-दायिनी सत्यसन्धा सागरमेखला ॥ १३५॥
सर्वार्थदात्री सावित्री सच्चिदानन्द-रूपिणी ॥ १३६॥
सरस्वती शास्त्रमयी गुहाम्बा गुह्यरूपिणी ॥ १३७॥
सम्प्रदायेश्वरी साध्वी गुरुमण्डल-रूपिणी ॥ १३८॥
गणाम्बा गुह्यकाराध्या कोमलाङ्गी गुरुप्रिया ॥ १३९॥
सनकादि-समाराध्या शिवज्ञान-प्रदायिनी ॥ १४०॥
नामपारायण-प्रीता नन्दिविद्या नटेश्वरी ॥ १४१॥
लास्यप्रिया लयकरी लज्जा रम्भादिवन्दिता ॥ १४२॥
दौर्भाग्य-तूलवातूला जराध्वान्त-रविप्रभा ॥ १४३॥
रोगपर्वत-दम्भोलिर्मृत्युदारु-कुठारिका ॥ १४४॥
अपर्णा चण्डिका चण्डमुण्डासुर-निषूदिनी ॥ १४५॥
त्रिवर्गदात्री सुभगा त्र्यम्बका त्रिगुणात्मिका ॥ १४६॥
ओजोवती द्युतिधरा यज्ञरूपा प्रियव्रता ॥ १४७॥
महती मेरुनिलया मन्दार-कुसुम-प्रिया ॥ १४८॥
प्रत्यग्रूपा पराकाशा प्राणदा प्राणरूपिणी ॥ १४९॥
त्रिपुरेशी जयत्सेना निस्त्रैगुण्या परापरा ॥ १५०॥
कपर्दिनी कलामाला कामधुक् कामरूपिणी ॥ १५१॥
पुष्टा पुरातना पूज्या पुष्करा पुष्करेक्षणा ॥ १५२॥
पाशहस्ता पाशहन्त्री परमन्त्र-विभेदिनी ॥ १५३॥
सत्यव्रता सत्यरूपा सर्वान्तर्यामिनी सती ॥ १५४॥
प्रसवित्री प्रचण्डाऽऽज्ञा प्रतिष्ठा प्रकटाकृतिः ॥ १५५॥
विशृङ्खला विविक्तस्था वीरमाता वियत्प्रसूः ॥ १५६॥
भावज्ञा भवरोगघ्नी भवचक्र-प्रवर्तिनी ॥ १५७॥
उदारकीर्तिरुद्दामवैभवा वर्णरूपिणी ॥ १५८॥
सर्वोपनिष-दुद्-घुष्टा शान्त्यतीत-कलात्मिका ॥ १५९॥
कल्पना-रहिता काष्ठाऽकान्ता कान्तार्ध-विग्रहा ॥ १६०॥
कनत्कनकता-टङ्का लीला-विग्रह-धारिणी ॥ १६१॥
अन्तर्मुख-समाराध्या बहिर्मुख-सुदुर्लभा ॥ १६२॥
निरामया निरालम्बा स्वात्मारामा सुधासृतिः ॥ १६३॥
यज्ञप्रिया यज्ञकर्त्री यजमान-स्वरूपिणी ॥ १६४॥
विप्रप्रिया विप्ररूपा विश्वभ्रमण-कारिणी ॥ १६५॥
अयोनिर्योनिनिलया कूटस्था कुलरूपिणी ॥ १६६॥
विज्ञानकलना कल्या विदग्धा बैन्दवासना ॥ १६७॥
सामगानप्रिया सौम्या सदाशिव-कुटुम्बिनी ॥ १६८॥
स्वस्था स्वभावमधुरा धीरा धीरसमर्चिता ॥ १६९॥
सदोदिता सदातुष्टा तरुणादित्य-पाटला ॥ १७०॥
कौलिनी-केवलाऽनर्घ्य-कैवल्य-पददायिनी ॥ १७१॥
मनस्विनी मानवती महेशी मङ्गलाकृतिः ॥ १७२॥
प्रगल्भा परमोदारा परामोदा मनोमयी ॥ १७३॥
पञ्चयज्ञ-प्रिया पञ्च-प्रेत-मञ्चाधिशायिनी ॥ ७४॥
शाश्वती शाश्वतैश्वर्या शर्मदा शम्भुमोहिनी ॥ १७५॥
लोकातीता गुणातीता सर्वातीता शमात्मिका ॥ १७६॥
सुमङ्गली सुखकरी सुवेषाढ्या सुवासिनी ॥ १७७॥
बिन्दु-तर्पण-सन्तुष्टा पूर्वजा त्रिपुराम्बिका ॥ १७८॥
ज्ञानमुद्रा ज्ञानगम्या ज्ञानज्ञेय-स्वरूपिणी ॥ १७९॥
अनघाऽद्भुत-चारित्रा वाञ्छितार्थ-प्रदायिनी ॥ १८०॥
अव्याज-करुणा-मूर्तिरज्ञान-ध्वान्त-दीपिका ॥ १८१॥
श्रीचक्रराज-निलया श्रीमत्-त्रिपुरसुन्दरी ॥ १८२॥
एवं श्रीललिता देव्या नाम्नां साहस्रकं जगुः ॥
श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्रम् पाठ क्या है?
ललिता का अर्थ है - 'वह जो सहज ही आनंदमयी और क्रीड़ामयी हैं' और त्रिपुरसुन्दरी का अर्थ है - 'तीनों लोकों में सबसे सुंदर'। इस स्तोत्र की रचना स्वयं वशिष्ठ आदि वाग्देवताओं (वाणी की देवियों) ने माता ललिता के आदेश पर की थी।
तकनीकी और आध्यात्मिक दृष्टि से, यह पाठ श्री विद्या उपासना और श्री चक्र (Shri Yantra) की साधना का मूल आधार है। जब साधक इसके दिव्य नामों का उच्चारण करता है, तो उसके भीतर छिपी हुई शक्ति (कुण्डलिनी) जाग्रत होने लगती है।
श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्रम् पाठ के लाभ
यदि कोई व्यक्ति पूरी श्रद्धा और नियम के साथ इस स्तोत्र का नियमित पाठ करता है, तो उसे लौकिक (भौतिक) और पारलौकिक (आध्यात्मिक) दोनों प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। इसके मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं:
- आर्थिक तंगी और कर्ज से मुक्ति - माता ललिता महालक्ष्मी का ही सर्वोच्च स्वरूप हैं। इस पाठ के प्रभाव से घर की दरिद्रता दूर होती है, व्यापार में उन्नति होती है और फंसा हुआ धन वापस मिलने के मार्ग खुलते हैं। कर्ज के बोझ से दबे लोगों के लिए यह पाठ वरदान साबित होता है।
- असाध्य रोगों और अकाल मृत्यु से रक्षा - इस स्तोत्र में माता के कई नाम आरोग्य प्रदान करने वाले हैं। ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति गंभीर बीमारियों से जूझ रहा है, यदि उसके सामने इस स्तोत्र का पाठ किया जाए या वह स्वयं करे, तो शरीर की ऊर्जा प्रणाली संतुलित होती है और स्वास्थ्य में तेजी से सुधार आता है।
- मानसिक शांति और तनाव से मुक्ति - आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव, अवसाद (Depression) और मानसिक अशांति आम बात है। ललिता सहस्रनाम के अक्षरों की ध्वनि तरंगें मस्तिष्क में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं, जिससे चित्त शांत और एकाग्र होता है।
- गृहक्लेश का नाश और रिश्तों में मधुरता - यदि परिवार में अक्सर मनमुटाव रहता हो या वैवाहिक जीवन में समस्याएं आ रही हों, तो इस पाठ को करने से घर का वातावरण शांत होता है। यह पारिवारिक संबंधों में आपसी प्रेम और समझ को बढ़ाता है।
- नकारात्मक शक्तियों और शत्रुओं पर विजय - इस पाठ को करने वाले साधक के चारों ओर एक सुरक्षा कवच (Aura) बन जाता है। इससे बुरी नजर, तंत्र-मंत्र का प्रभाव, ऊपरी बाधाएं और छिपे हुए शत्रुओं का भय पूरी तरह समाप्त हो जाता है।
श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्रम् पाठ की सही विधि
किसी भी मंत्र या स्तोत्र का पूरा फल तभी मिलता है जब उसे सही विधि और विधान के साथ किया जाए। श्री ललिता सहस्रनाम पाठ के लिए नीचे दी गई विधि का पालन करें:
- इस पाठ को करने के लिए सर्वोत्तम समय 'ब्रह्ममुहूर्त' (सुबह ४ से ६ बजे) या संध्याकाल माना जाता है। शुक्रवार, नवरात्रि, पूर्णिमा या चतुर्दशी के दिन से इस पाठ को शुरू करना बेहद शुभ फलदायी होता है।
- स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ पीले या लाल रंग के वस्त्र धारण करें। पाठ के लिए कुशा (घास) या ऊनी कंबल के लाल रंग के आसन का प्रयोग करें।
- आपका मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। अपने सामने एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर माता ललिता त्रिपुरसुन्दरी की तस्वीर या 'श्री यंत्र' स्थापित करें।
- माता के सम्मुख गाय के घी का दीपक और धूप जलाएं। श्रीयंत्र या माता के चित्र पर कुमकुम, अक्षत और लाल रंग के फूल (विशेषकर गुड़हल या गुलाब) अर्पित करें।
- पाठ शुरू करने से पहले हाथ में थोड़ा जल और फूल लेकर अपनी मनोकामना कहें (संकल्प लें) और उसे जमीन पर छोड़ दें।
- स्तोत्र पुस्तक में दिए गए 'न्यास' (अंगों को शुद्ध करना) और 'ध्यानम्' के श्लोकों को अवश्य पढ़ें। इसके बिना पाठ अधूरा माना जाता है।
- नामों का उच्चारण स्पष्ट और शुद्ध होना चाहिए। न तो बहुत तेजी से भागें और न ही बहुत ज्यादा धीमे स्वर में पढ़ें। यदि आप संस्कृत नहीं पढ़ पाते, तो इसके हिंदी अनुवाद या नामवली (ॐ श्रीमात्रे नमः आदि) का पाठ भी कर सकते हैं।
श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्रम् पाठ - विशेष नियम और सावधानियां
- इस साधना के दौरान मन, वचन और कर्म से शुद्धता बनाए रखें। मांस, मदिरा और तामसिक भोजन का त्याग करें।
- यदि आप रोज पाठ नहीं कर सकते, तो कम से कम हर शुक्रवार या पूर्णिमा को इसका पाठ अवश्य करें।
- महिलाओं के लिए मासिक धर्म (Periods) के दौरान इस पाठ को वर्जित माना गया है, उन दिनों में केवल मानसिक रूप से स्मरण किया जा सकता है।
- पाठ के बीच में किसी से बात न करें। यदि किसी कारणवश रुकना पड़े, तो दोबारा आचमन करके ही शुरू करें।

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