दस महाविद्याओं में से एक अत्यंत जाग्रत और शक्तिशाली रूप मां छिन्नमस्तिका का है। माता का यह दिव्य स्वरूप पहली बार देखने में थोड़ा डरावना या विचित्र लग सकता है क्योंकि वे अपने एक हाथ में अपना ही कटा हुआ सिर धारण किए हुए हैं और उनकी गर्दन से निकल रही रक्त की तीन धाराएं उनकी दो सखियां जया और विजया और स्वयं मां पी रही हैं। लेकिन इस स्वरूप के पीछे ब्रह्मांड का बहुत बड़ा सच और त्याग छिपा हुआ है। झारखंड के रजरप्पा में मां का विश्व प्रसिद्ध धाम है जहाँ हर साल लाखों श्रद्धालु अपनी मन्नतें लेकर आते हैं। कलयुग के इस समय में मां छिन्नमस्तिका चालीसा का पाठ करना जीवन के सबसे बड़े दुखों और संकटों को तुरंत खत्म करने का अचूक जरिया माना जाता है।
आजकल की इस कॉम्पिटिटिव लाइफ में इंसान चारों तरफ से दुश्मनों की चालों, भारी कर्ज, कानूनी मुकदमों और मानसिक तनाव से घिरा हुआ है। तंत्र शास्त्र और वैदिक ज्योतिष के अनुसार जो लोग विशेष रूप से गुप्त नवरात्रि, अमावस्या या हर महीने की अष्टमी तिथि को मां की भक्ति करते हैं उनकी हर मनोकामना बहुत तेजी से पूरी होती है। मां छिन्नमस्तिका की साधना से इंसान के भीतर का सारा डर गायब हो जाता है और उसे लाइफ में एक नया कॉन्फिडेंस मिलता है। यदि आप भी अपने जीवन की रुकावटों को जड़ से खत्म करना चाहते हैं तो इस पावन चालीसा का सहारा लें।
मां छिन्नमस्तिका चालीसा में बहुत ही सुंदर तरीके से मां के प्रकट होने की पूरी कथा बताई गई है। इसमें वर्णन है कि कैसे एक बार दामोदर और भैरवी नदी के संगम पर नहाने के बाद मां की सखियों को बहुत तेज भूख लगी थी और उनकी भूख शांत करने के लिए मां ने ममता के वश में होकर तुरंत अपना ही मस्तक काट दिया था। आज के आधुनिक और इंटरनेट के दौर में ज्यादातर लोग अपने मोबाइल फोन या टैबलेट का उपयोग करके ही पूजा-पाठ करना पसंद करते हैं ताकि वे सफर में या कहीं बाहर होने पर भी अपनी पूजा मिस न करें। मां छिन्नमस्तिका चालीसा पाठ PDF को ऑनलाइन डाउनलोड करके अपने डिवाइस में रखना एक बहुत ही समझदारी भरा और आसान काम है। यह पीडीएफ फाइल इंटरनेट पर बिल्कुल फ्री में मिल जाती है जहाँ से आप इसे एक क्लिक में सेव कर सकते हैं।
|| माँ छिन्नमस्तिका चालीसा (Maa Chhinnamastaka Chalisa PDF) ||
॥ दोहा ॥
अपना मस्तक काट कर लीन्ह हाथ में थाम।
कमलासन पर पग तले दलित हुए रतिकाम।।
जगतारण ही काम है, रजरप्पा है धाम।
छिन्नमस्तका को करूं बारंबार प्रणाम।।
॥ चौपाई ॥
जय गणेश जननी गुण खानी। जयति छिन्नमस्तका भवानी।।
Gouri सती उमा रुद्राणी। जयति महाविद्या कल्याणी।।
सर्वमंगला मंगलकारी। मस्तक खड्ग धरे अविकारी।।
रजरप्पा में वास तुम्हारा। तुमसे सदा जगत उजियारा।।
तुमसे जगत चराचर माता। भजें तुम्हें शिव विष्णु विधाता।।
यति मुनीन्द्र नित ध्यान लगावें। नारद शेष नित्य गुण गावें।
मेधा ऋषि को तुमने तारा। सूरथ का सौभाग्य निखारा।।
वैश्य समाधि ज्ञान से मंडित। हुआ अंबिके पल में पंडित।।
रजरप्पा का कण-कण न्यारा। दामोदर पावन जल धारा।।
मिली जहां भैरवी भवानी। महिमा अमित न जात बखानी।।
जय शैलेश सुता अति प्यारी। जया और विजया सखि प्यारी।।
संगम तट पर गई नहाने। लगी सखियों को भूख सताने।।
तब सखियन ने भोजन मांगा। सुन चित्कार जगा अनुरागा।।
निज सिर काट तुरत दिखलाई। अपना शोणित उन्हें पिलाई।।
तबसे कहें सकल बुध ज्ञानी। जयतु छिन्नमस्ता वरदानी।।
तुम जगदंब अनादि अनन्ता। गावत सतत वेद मुनि सन्ता।।
उड़हुल फूल तुम्हें अति भाये। सुमन कनेर चरण रज पाये।।
भंडारदह संगम तट प्यारे। एक दिवस एक विप्र पधारे।
लिए शंख चूड़ी कर माला। आयी एक मनोरम बाला।।
गौर बदन शशि सुन्दर मज्जित। रक्त वसन शृंगार सुसज्जित।।
बोली विप्र इधर तुम आओ। मुझे शंख चूड़ी पहनाओ।।
बाला को चूड़ी पहनाकर। चला विप्र अतिशय सुख पाकर।।
सुनहु विप्र बाला तब बोली। जटिल रहस्य पोटली खोली।।
परम विचित्र चरित्र अखंडा। मेरे जनक जगेश्वर पंडा।।
दाम तोहि चूड़ी कर देंगे। अति हर्षित सत्कार करेंगे।।
पहुंचे द्विज पंडा के घर पर। चकित हुए वह भी सब सुनकर।।
दोनों भंडार दह पर आये। छिन्नमस्ता का दर्शन पाये।।
उदित चंद्रमुख शोषिण वसनी। जन मन कलुष निशाचर असनी।।
रक्त कमल आसन सित ज्वाला। दिव्य रूपिणी थी वह बाला।।
बोली छिन्नमस्तका माई। भंडार दह हमरे मन भाई।।
जाको विपदा बहुत सतावे। दुर्जन प्रेत जिसे धमकावे।।
बढ़े रोग ऋण रिपु की पीरा। होय कष्ट से शिथिल शरीरा।।
तो नर कबहूं न मन भरमावे। तुरंत भाग रजरप्पा आवे।।
करे भक्ति पूर्वक जब पूजा। सुखी न हो उसके सम दूजा।।
उभय विप्र ने किन्ह प्रणामा। पूर्ण भये उनके सब कामा।।
पढ़े छिन्नमस्ता चालीसा। अंबहि नित्य झुकावहिं सीसा।।
ता पर कृपा मातु की होई। फिर वह करै चहे मन जोई।।
मैं अति नीच लालची कामी। नित्य स्वार्थरत दुर्जन नामी।।
छमहुं छिन्नमस्ता जगदम्बा। करहुं कृपा मत करहुं विलंबा।।
‘विनय’ दीन आरत सुत जानी। करहुं कृपा जगदंब भवानी।।
॥ दोहा ॥
जयतु वज्र वैरोचनी, जय चंडिका प्रचंड।
तीन लोक में व्याप्त है, तेरी ज्योति अखंड।।
छिन्नमस्तके अम्बिके, तेरी कीर्ति अपार।
नमन तुम्हें शतबार है, कर मेरा उद्धार।।
॥ इति श्री छिन्नमस्तका चालीसा सम्पूर्ण ॥
मां छिन्नमस्तिका चालीसा पाठ के लाभ
पूरी निष्ठा, साफ मन और गहरी श्रद्धा के साथ मां छिन्नमस्तिका देवी की चालीसा का नियमित पाठ करने से भक्तों को अपने जीवन में ऐसे अद्भुत बदलाव दिखने लगते हैं जिनकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की होती। महाविद्या की यह शक्ति अपने भक्तों की पुकार को बहुत ही तेजी से सुनती है और उनके रास्ते की हर रुकावट को पल भर में भस्म कर देती है।
यदि कोई भी श्रद्धालु इस चमत्कारी चालीसा को अपने जीवन का हिस्सा बनाता है या हर शनिवार को इसका पाठ करता है तो उसे मिलने वाले मुख्य लाभ कुछ इस प्रकार हैं:
- यदि आपके गुप्त दुश्मन आपको लगातार परेशान कर रहे हैं या ऑफिस में कोई आपकी तरक्की रोक रहा है तो यह पाठ आपके लिए रामबाण है। इसके प्रभाव से आपके विरोधियों की हर चाल नाकाम हो जाती है और मुकदमों में आपको बड़ी सफलता मिलती है।
- जो लोग कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं और लाख कोशिशों के बाद भी पैसा नहीं टिक रहा है उन्हें यह पाठ जरूर करना चाहिए। मां की कृपा से धन के नए और अच्छे रास्ते खुलते हैं जिससे पुराना लोन धीरे-धीरे खत्म हो जाता है और घर में बरकत आती है।
- मां छिन्नमस्तिका को तंत्र की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है इसलिए इस चालीसा का नियमित गान करने वाले व्यक्ति पर किसी भी तरह के काले जादू, ऊपरी हवा या बुरी नजर का असर बिल्कुल नहीं होता और घर का माहौल सुरक्षित रहता है।
- यदि कोई इंसान लंबे समय से बीमार है और दवाओं का कोई असर नहीं हो रहा है तो इस पाठ के जाप से शरीर के भीतर की बीमारी धीरे-धीरे कम होने लगती है। यह चालीसा कमजोर शरीर को फिर से सुदृढ़ और सेहतमंद बनाने की ताकत रखती है।
- मां का यह रूप रीढ़ की हड्डी के भीतर छिपी कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करने वाला माना गया है। विद्यार्थी या ध्यान लगाने वाले लोग यदि इस चालीसा को पढ़ते हैं तो उनकी याददाश्त बहुत तेज होती है और कठिन से कठिन विषयों को समझने की क्षमता बढ़ जाती है।
मां छिन्नमस्तिका चालीसा पाठ की सही विधि
शास्त्रों के अनुसार किसी भी उग्र या महाविद्या रूप की पूजा करते समय नियमों का सही तरीके से पालन करना और मन में पूर्ण सात्विकता बनाए रखना बेहद जरूरी होता है। मां छिन्नमस्तिका की पूजा में शुद्धता, सही दिशा और सच्चे समर्पण का होना सबसे बड़ा महत्व रखता है क्योंकि वे भाव की भूखी हैं। सही तरीके से और सही नियम से किया गया यह पाठ हमेशा बहुत जल्दी और मनचाहा फल देने वाला साबित होता है।
यदि आप भी अपने जीवन के बड़े संकटों को समाप्त करने और मां रजरप्पा वाली का दिव्य आशीर्वाद पाने के लिए इस चालीसा का पाठ शुरू करना चाहते हैं तो इस आसान और सही विधि को अपनाएं:
- इस पावन पाठ को करने के लिए सुबह या ब्रह्म मुहूर्त का समय सबसे बढ़िया माना जाता है। सुबह जल्दी उठकर नहा धो लें और पूरी तरह साफ कपड़े पहनें। मां की पूजा में लाल या पीले रंग के कपड़ों का प्रयोग करना सबसे ज्यादा फलदायी और शुभ माना गया है।
- अपने घर के पूजा स्थल को अच्छे से साफ कर लें। एक लकड़ी की छोटी चौकी पर लाल रंग का नया कपड़ा बिछाएं और उस पर मां छिन्नमस्तिका की तस्वीर स्थापित करें। यदि तस्वीर न हो तो आप मां दुर्गा की मूर्ति के सामने भी यह पाठ शुरू कर सकते हैं।
- माता रानी की प्रतिमा के सामने गाय के शुद्ध घी का या फिर तिल के तेल का एक दीपक जलाएं। साथ में अच्छी सुगंध वाली धूपबत्ती भी सुलगाएं। मां को कुंकुम, रोली और अक्षत का तिलक लगाएं और उनके चरणों में लाल रंग के फूल, विशेषकर गुड़हल अर्पित करें।
- पूजा के समय माता को भोग लगाने के लिए दूध से बनी सात्विक मिठाई, मिश्री, मखाने की खीर या ऋतु फल अर्पित करें। तामसिक चीजों का भोग भूलकर भी न लगाएं। भोग लगाने के बाद मां से अपने अनजाने में हुए पापों के लिए क्षमा मांगें।
- अब ऊन या कुशा के बने साफ आसन पर बैठ जाएं और अपना मुंह पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें। पूरी एकाग्रता और साफ शब्दों में मां छिन्नमस्तिका चालीसा का पाठ करें। पाठ पूरा होने के बाद कपूर से मां की आरती करें और शांत मन से कुछ देर ध्यान लगाएं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या कोई भी आम गृहस्थ इंसान इस चालीसा का पाठ अपने घर में कर सकता है?
हाँ, कोई भी साधारण या गृहस्थ व्यक्ति मां छिन्नमस्तिका चालीसा का पाठ अपने घर में बहुत ही आसानी से कर सकता है। मां का यह चालीसा पाठ पूरी तरह सुरक्षित और सात्विक है, बस आपको मन में अच्छी भावना रखनी होगी और पूजा के दौरान साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखना होगा।
इस चमत्कारी चालीसा का पाठ शुरू करने के लिए कौन सा दिन सबसे बेस्ट माना जाता है?
इस पवित्र चालीसा का पाठ शुरू करने के लिए मंगलवार या शनिवार का दिन सबसे उत्तम और फलदायी माना जाता है। इसके अलावा आप किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि, अमावस्या की रात या गुप्त नवरात्रि के पहले दिन से भी इसकी शुरुआत कर सकते हैं जो बहुत शुभ होता है।
क्या इस पाठ को रात के समय करना ज्यादा फायदेमंद होता है?
चूंकि मां छिन्नमस्तिका महाविद्या का रूप हैं, इसलिए तंत्र शास्त्र में इनकी पूजा रात के समय करने का बड़ा महत्व है। अगर आप चाहें तो रात को 9 बजे के बाद हाथ-पैर धोकर और साफ कपड़े पहनकर शांत माहौल में दीपक जलाकर इसका पाठ कर सकते हैं। रात में पाठ करने से मानसिक शांति बहुत जल्दी मिलती है।
मां छिन्नमस्तिका चालीसा पाठ के दौरान किन बातों का परहेज करना जरूरी है?
इस पाठ की साधना के दौरान सात्विकता का कड़ाई से पालन करना चाहिए। जितने दिन भी आप इस चालीसा का पाठ करते हैं उतने दिन आपको पूरी तरह से ब्रह्मचर्य का पालन करना होगा और घर में मांस, मदिरा, अंडा, लहसुन और प्याज जैसे हर तरह के तामसिक भोजन के प्रवेश पर पूरी तरह रोक लगानी होगी।

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