॥ श्री शिव सहस्रनाम स्तोत्रम् पाठ ॥
सर्वात्मा सर्वविख्यातः सर्वः सर्वकरो भवः ॥
हरिश्च हरिणाक्षश्च सर्वभूतहरः प्रभुः ॥
श्मशानचारी भगवान् खचरो गोचरोऽर्दनः ॥
उन्मत्तवेषप्रच्छन्नः सर्वलोकप्रजापतिः ॥
महाऽऽत्मा सर्वभूतश्च विरूपो वामनो मनुः ॥
पवित्रश्च महांश्चैव नियमो नियमाश्रयः ॥
सहस्राक्षो विरूपाक्षः सोमो नक्षत्रसाधकः ॥
अद्रिरद्र्यालयः कर्ता मृगबाणार्पणोऽनघः ॥
संवत्सरकरो मन्त्रः प्रमाणं परमं तपः ॥
सुवर्णरेताः सर्वज्ञः सुबीजो वृषवाहनः ॥
विश्वरूपः स्वयं श्रेष्ठो बलवीरोऽबलोगणः ॥
पवित्रं परमं मन्त्रः सर्वभाव करो हरः ॥
अशनी शतघ्नी खड्गी पट्टिशी चायुधी महान् ॥
उष्णिषी च सुवक्त्रश्चोदग्रो विनतस्तथा ॥
सृगाल रूपः सर्वार्थो मुण्डः कुण्डी कमण्डलुः ॥
ऊर्ध्वरेतोर्ध्वलिंग ऊर्ध्वशायी नभस्तलः ॥
अहश्चरोऽथ नक्तं च तिग्ममन्युः सुवर्चसः ॥
सिंहशार्दूलरूपश्च आर्द्रचर्मांबरावृतः ॥
निशाचरः प्रेतचारी भूतचारी महेश्वरः ॥
नृत्यप्रियो नित्यनर्तो नर्तकः सर्वलासकः ॥
सहस्रहस्तो विजयो व्यवसायो ह्यनिन्दितः ॥
दक्षयज्ञापहारी च सुसहो मध्यमस्तथा ॥
गंभीरघोषो गंभीरो गंभीर बलवाहनः ॥
सुदीक्ष्णदशनश्चैव महाकायो महाननः ॥
तीक्ष्ण तापश्च हर्यश्वः सहायः कर्मकालवित् ॥
हुताशनसहायश्च प्रशान्तात्मा हुताशनः ॥
ज्योतिषामयनं सिद्धिः संधिर्विग्रह एव च ॥
वैणवी पणवी ताली कालः कालकटंकटः ॥
प्रजापतिर्दिशा बाहुर्विभागः सर्वतोमुखः ॥
मेढ्रजो बलचारी च महाचारी स्तुतस्तथा ॥
व्यालरूपो बिलावासी हेममाली तरंगवित् ॥
बन्धनस्त्वासुरेन्द्राणां युधि शत्रुविनाशनः ॥
प्रस्कन्दनो विभागश्चातुल्यो यज्ञभागवित् ॥
हेमो हेमकरो यज्ञः सर्वधारी धरोत्तमः ॥
संग्रहो निग्रहः कर्ता सर्पचीरनिवासनः ॥
सर्वकामप्रसादश्च सुबलो बलरूपधृक् ॥
आकाशनिधिरूपश्च निपाती उरगः खगः ॥
वसुवेगो महावेगो मनोवेगो निशाचरः ॥
मुनिरात्म पतिर्लोके संभोज्यश्च सहस्रदः ॥
उन्मादो मदनाकारो अर्थार्थकर रोमशः ॥
सिद्धयोगापहारी च सिद्धः सर्वार्थसाधकः ॥
महासेनो विशाखश्च षष्टिभागो गवांपतिः ॥
ऋतुरृतु करः कालो मधुर्मधुकरोऽचलः ॥
ब्रह्मचारी लोकचारी सर्वचारी सुचारवित् ॥
निमित्तस्थो निमित्तं च नन्दिर्नन्दिकरो हरिः ॥
भगस्याक्षि निहन्ता च कालो ब्रह्मविदांवरः ॥
लिंगाध्यक्षः सुराध्यक्षो लोकाध्यक्षो युगावहः ॥
इतिहास करः कल्पो गौतमोऽथ जलेश्वरः ॥
लोक कर्ता पशु पतिर्महाकर्ता महौषधिः ॥
नीतिर्ह्यनीतिः शुद्धात्मा शुद्धो मान्यो मनोगतिः ॥
वेदकारः सूत्रकारो विद्वान् समरमर्दनः ॥
अग्निज्वालो महाज्वालो अतिधूम्रो हुतो हविः ॥
नीलस्तथाऽंगलुब्धश्च शोभनो निरवग्रहः ॥
उत्संगश्च महांगश्च महागर्भः परो युवा ॥
महापादो महाहस्तो महाकायो महायशाः ॥
महादन्तो महाकर्णो महामेढ्रो महाहनुः ॥
महावक्षा महोरस्को अन्तरात्मा मृगालयः ॥
महादन्तो महादंष्ट्रो महाजिह्वो महामुखः ॥
असपत्नः प्रसादश्च प्रत्ययो गिरि साधनः ॥
वृक्षाकारो वृक्ष केतुरनलो वायुवाहनः ॥
अथर्वशीर्षः सामास्य ऋक्सहस्रामितेक्षणः ॥
अमोघार्थः प्रसादश्चाभिगम्यः सुदर्शनः ॥
नाभिर्नन्दिकरो भाव्यः पुष्करस्थपतिः स्थिरः ॥
नक्तं कलिश्च कालश्च मकरः कालपूजितः ॥
भस्मशायी भस्मगोप्ता भस्मभूतस्तरुर्गणः ॥
शंकुस्त्रिशंकुः सम्पन्नः शुचिर्भूतनिषेवितः ॥
शाखो विशाखस्ताम्रोष्ठो ह्यमुजालः सुनिश्चयः ॥
gन्धर्वो ह्यदितिस्तार्क्ष्यः सुविज्ञेयः सुसारथिः ॥
तुंबवीणी महाकोपोर्ध्वरेता जलेशयः ॥
सर्वांगरूपो मायावी सुहृदो ह्यनिलोऽनलः ॥
सयज्ञारिः सकामारिः महादंष्ट्रो महाऽऽयुधः ॥
अमरेशो महादेवो विश्वदेवः सुरारिहा ॥
अजैकपाच्च कापाली त्रिशंकुरजितः शिवः ॥
धाता शक्रश्च विष्णुश्च मित्रस्त्वष्टा ध्रुवो धरः ॥
उदग्रश्च विधाता च मान्धाता भूत भावनः ॥
पद्मगर्भो महागर्भश्चन्द्रवक्त्रोमनोरमः ॥
कुरुकर्ता कालरूपी कुरुभूतो महेश्वरः ॥
देवदेवः मुखोऽसक्तः सदसत् सर्वरत्नवित् ॥
कूलहारी कूलकर्ता बहुविद्यो बहुप्रदः ॥
सारग्रीवो महाजत्रु रलोलश्च महौषधः ॥
सिंहनादः सिंहदंष्ट्रः सिंहगः सिंहवाहनः ॥
सारंगो नवचक्रांगः केतुमाली सभावनः ॥
अमोघः संयतो ह्यश्वो भोजनः प्राणधारणः ॥
गोपालिर्गोपतिर्ग्रामो गोचर्मवसनो हरः ॥
प्रतिष्ठायी महाहर्षो जितकामो जितेन्द्रियः ॥
महागीतो महानृत्तोह्यप्सरोगणसेवितः ॥
आवेदनीय आवेशः सर्वगन्धसुखावहः ॥
संयोगो वर्धनो वृद्धो महावृद्धो गणाधिपः ॥
युक्तश्च युक्तबाहुश्च द्विविधश्च सुपर्वणः ॥
वपुरावर्तमानेभ्यो वसुश्रेष्ठो महापथः ॥
अक्षश्च रथ योगी च सर्वयोगी महाबलः ॥
निर्जीवो जीवनो मन्त्रः शुभाक्षो बहुकर्कशः ॥
मूलो विशालो ह्यमृतो व्यक्ताव्यक्तस्तपो निधिः ॥
सेनाकल्पो महाकल्पो युगायुग करो हरिः ॥
न्याय निर्वापणः पादः पण्डितो ह्यचलोपमः ॥
विस्तारो लवणः कूपः कुसुमः सफलोदयः ॥
इन्दुर्विसर्वः सुमुखः सुरः सर्वायुधः सहः ॥
गन्धमाली च भगवान् उत्थानः सर्वकर्मणाम् ॥
तरस्ताली करस्ताली ऊर्ध्व संहननो वहः ॥
मुण्डो विरूपो विकृतो दण्डि मुण्डो विकुर्वणः ॥
सहस्रमूर्धा देवेन्द्रः सर्वदेवमयो गुरुः ॥
पवित्रं त्रिमधुर्मन्त्रः कनिष्ठः कृष्णपिंगलः ॥
पद्मगर्भो महागर्भो ब्रह्मगर्भो जलोद्भवः ॥
अनन्तरूपो नैकात्मा तिग्मतेजाः स्वयंभुवः ॥
उमापतिरुमाकान्तो जाह्नवी धृगुमाधवः ॥
महाप्रसादो दमनः शत्रुहा श्वेतपिंगलः ॥
सर्वपार्श्व सुतस्तार्क्ष्यो धर्मसाधारणो वरः ॥
साध्यर्षिर्वसुरादित्यो विवस्वान् सविताऽमृतः ॥
ऋतुः संवत्सरो मासः पक्षः संख्या समापनः ॥
विश्वक्षेत्रं प्रजाबीजं लिंगमाद्यस्त्वनिन्दितः ॥
स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम् ॥
देवासुरविनिर्माता देवासुरपरायणः ॥
देवासुरमहामात्रो देवासुरगणाश्रयः ॥
देवातिदेवो देवर्षिर्देवासुरवरप्रदः ॥
सर्वदेवमयोऽचिन्त्यो देवताऽऽत्माऽऽत्मसंभवः ॥
ईड्यो हस्ती सुरव्याघ्रो देवसिंहो नरर्षभः ॥
प्रयुक्तः शोभनो वर्जैशानः प्रभुर्व्ययः ॥
शृंगी शृंगप्रियो बभ्रू राजराजो निरामयः ॥
ललाटाक्षो विश्वदेहो हरिणो ब्रह्मवर्चसः ॥
सिद्धार्थः सर्वभूतार्थोऽचिन्त्यः सत्यव्रतः शुचिः ॥
विमुक्तो मुक्ततेजाश्च श्रीमान् श्रीवर्धनो जगत् ॥
श्री शिव सहस्रनाम स्तोत्रम् पाठ के चमत्कारी लाभ
महादेव के 1000 नामों का जप केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं है, बल्कि यह जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने वाला एक वैज्ञानिक माध्यम भी है। इस पाठ को नियमित करने से निम्नलिखित लाभ मिलते हैं:
- इस स्तोत्र के अक्षरों की ध्वनि तरंगें मस्तिष्क को शांत करती हैं, जिससे मानसिक तनाव, डिप्रेशन और एंग्जायटी से मुक्ति मिलती है।
- यदि आपकी कुंडली में राहु-केतु, शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या या महादशा के कारण परेशानियां चल रही हैं, तो शिव सहस्रनाम का पाठ रामबाण की तरह काम करता है।
- 'भव', 'शिव' और 'प्रभु' जैसे नामों के बार-बार उच्चारण से दरिद्रता का नाश होता है और व्यापार व नौकरी में उन्नति के नए मार्ग खुलते हैं।
- भगवान शिव महाकाल हैं। इस पाठ को करने वाले साधक के पास नकारात्मक शक्तियां, अकाल मृत्यु का भय और तंत्र-मंत्र का असर नहीं फटकता।
- असाध्य रोगों से पीड़ित व्यक्ति के लिए इस स्तोत्र का पाठ या श्रवण करना स्वास्थ्य में सुधार लाता है।
श्री शिव सहस्रनाम स्तोत्रम् पाठ की सही विधि
किसी भी मंत्र या स्तोत्र का पूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब उसे सही नियम और विधि-विधान के साथ किया जाए। शिव सहस्रनाम पाठ के लिए नीचे दी गई सरल और सात्विक विधि का पालन करें:
- इस पाठ के लिए ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4 से 6 बजे) या संध्याकाल का समय सबसे उत्तम माना जाता है। विशेषकर सोमवार, प्रदोष व्रत, शिवरात्रि या सावन के महीने में इसे शुरू करना अत्यंत फलदायी होता है।
- स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र (संभव हो तो सफेद या पीले रंग के) धारण करें। पूजा के लिए कुशा या ऊन के आसन का प्रयोग करें और मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें।
- अपने सामने भगवान शिव की मूर्ति, चित्र या शिवलिंग स्थापित करें। हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर अपनी मनोकामना का स्मरण करते हुए संकल्प लें।
- पाठ शुरू करने से पहले महादेव को चंदन, भस्म, बेलपत्र, धतूरा और जल अर्पित करें। एक शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें जो पूरे पाठ के दौरान जलता रहे।
- अब शांत चित्त से श्री शिव सहस्रनाम स्तोत्रम् का पाठ शुरू करें। यदि आप स्वयं संस्कृत के शुद्ध उच्चारण में असमर्थ हैं, तो आप किसी योग्य पंडित से यह पाठ करवा सकते हैं या इसका ऑडियो स्पष्ट रूप से सुन भी सकते हैं।
- पाठ पूर्ण होने के बाद शिव जी की आरती करें और अनजाने में हुई किसी भी भूल के लिए हाथ जोड़कर क्षमा प्रार्थना अवश्य करें।
यदि आप इस स्तोत्र का अनुष्ठान कर रहे हैं, तो पाठ की अवधि के दौरान पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें। तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मांस-मदिरा) का पूरी तरह त्याग करें। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पाठ करते समय आपका मन किसी के प्रति द्वेष या दुर्भावना से मुक्त होना चाहिए, क्योंकि महादेव भाव के भूखे हैं।
ओम् नमः शिवाय! महादेव आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करें।

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