देवउठनी एकादशी 2026 का व्रत शुक्रवार, 20 नवंबर 2026 को रखा जाएगा। यह कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि होती है और इसे प्रबोधिनी एकादशी, देवोत्थान एकादशी तथा हरिप्रबोधिनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं। इसी कारण हिंदू धर्म में इस एकादशी का विशेष आध्यात्मिक महत्व माना जाता है।
देवउठनी एकादशी 2026 कब है?
देवउठनी एकादशी कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। वर्ष 2026 में यह तिथि नवंबर महीने में पड़ रही है। पंचांग गणना के अनुसार एकादशी तिथि 20 नवंबर 2026, शुक्रवार को सुबह 7:15 बजे आरंभ होगी और 21 नवंबर 2026, शनिवार को सुबह 6:31 बजे समाप्त होगी।
इसलिए सामान्य गृहस्थ परंपरा के अनुसार 20 नवंबर 2026 को देवउठनी एकादशी का व्रत रखा जाएगा।
देवउठनी एकादशी 2026 की मुख्य तिथियां
| विवरण | तिथि / समय |
|---|---|
| देवउठनी एकादशी | 20 नवंबर 2026, शुक्रवार |
| एकादशी तिथि प्रारंभ | 20 नवंबर 2026, सुबह 7:15 बजे |
| एकादशी तिथि समाप्त | 21 नवंबर 2026, सुबह 6:31 बजे |
| व्रत पारण | 21 नवंबर 2026, द्वादशी तिथि में |
| विशेष अवसर | तुलसी विवाह और चातुर्मास समाप्ति से जुड़ी परंपराएं |
देवउठनी एकादशी 2026 पारण कब करें?
एकादशी व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी तिथि में किया जाता है। वर्ष 2026 में देवउठनी एकादशी का पारण 21 नवंबर, शनिवार को किया जाएगा। पारण का सटीक समय आपके शहर के सूर्योदय और स्थानीय पंचांग के अनुसार अलग हो सकता है।
उदाहरण के लिए, बेंगलुरु के पंचांग में 21 नवंबर को दोपहर 1:14 बजे से 3:32 बजे तक पारण का समय दिया गया है, जबकि हांसी, हरियाणा में यह समय लगभग दोपहर 1:15 बजे से 3:22 बजे तक बताया गया है। इसलिए अपने शहर के अनुसार पारण का समय जरूर जांचें।
महत्वपूर्ण: पारण करने से पहले यह सुनिश्चित करें कि द्वादशी तिथि और हरिवासर का समय समाप्त हो चुका हो। स्थानीय पंचांग के अनुसार समय की पुष्टि करना सबसे उचित माना जाता है।
देवउठनी एकादशी क्यों मनाई जाती है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल एकादशी यानी देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन भगवान विष्णु के जागने की मान्यता है। इसी कारण इस तिथि को देवउठनी एकादशी या देवोत्थान एकादशी कहा जाता है।
इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत, दीपदान और तुलसी पूजा करने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवउठनी एकादशी से शुभ और मांगलिक कार्यों की शुरुआत का समय भी माना जाता है।
देवउठनी एकादशी 2026 का धार्मिक महत्व
देवउठनी एकादशी को भगवान विष्णु की आराधना के लिए विशेष दिन माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन व्रत और श्रद्धापूर्वक पूजा करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है तथा जीवन में सुख, शांति और आध्यात्मिक उन्नति की कामना की जाती है।
कार्तिक मास को भी हिंदू परंपरा में धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना गया है। इस पूरे महीने में भगवान विष्णु की भक्ति, दीपदान और दान-पुण्य करने की परंपरा रही है। देवउठनी एकादशी इस धार्मिक क्रम का विशेष पर्व मानी जाती है।
देवउठनी एकादशी के प्रमुख धार्मिक महत्व
- भगवान विष्णु की आराधना और भक्ति के लिए महत्वपूर्ण दिन माना जाता है।
- एकादशी व्रत के माध्यम से संयम और सात्विक जीवन का अभ्यास किया जाता है।
- तुलसी पूजा और दीपदान की विशेष परंपरा कई स्थानों पर प्रचलित है।
- धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन दान-पुण्य और सेवा का विशेष महत्व है।
- देवउठनी एकादशी के बाद कई हिंदू परंपराओं में मांगलिक कार्यों की शुरुआत की जाती है।
देवउठनी एकादशी 2026 पूजा विधि
देवउठनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा सरल और श्रद्धापूर्वक की जा सकती है। पूजा करते समय अपनी परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार विधि अपनाएं।
- प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और व्रत का संकल्प लें।
- पूजा स्थान को साफ करके भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- भगवान के सामने घी या तेल का दीपक जलाएं।
- चंदन, अक्षत, पुष्प, तुलसी दल, धूप और दीप अर्पित करें।
- भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी को विशेष रूप से अर्पित करने की परंपरा है।
- अपनी श्रद्धा के अनुसार भगवान विष्णु के नाम या मंत्र का जाप करें।
- देवउठनी एकादशी की कथा का श्रवण या पाठ करें।
- पूजा के अंत में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती करें।
- धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सामर्थ्य हो तो भजन, कीर्तन या भगवान के नाम का स्मरण करते हुए रात्रि जागरण किया जा सकता है।
देवउठनी एकादशी पर कौन-कौन सी चीजें चढ़ाएं?
पूजा में अपनी श्रद्धा और उपलब्धता के अनुसार भगवान विष्णु को निम्न वस्तुएं अर्पित की जा सकती हैं:
- तुलसी दल
- पीले पुष्प
- चंदन
- अक्षत
- धूप और दीप
- फल
- नैवेद्य या सात्विक भोग
देवउठनी एकादशी पर कौन सा मंत्र जपें?
भगवान विष्णु की पूजा करते समय निम्न मंत्र का जाप किया जा सकता है - ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। मंत्र जाप की संख्या से अधिक महत्व श्रद्धा और मन की एकाग्रता का माना जाता है। अपनी सुविधा के अनुसार मंत्र का जाप करें।
देवउठनी एकादशी व्रत में क्या खाएं?
एकादशी व्रत में अन्न और सामान्य अनाज का सेवन न करने की परंपरा है। व्रत का प्रकार व्यक्ति अपनी क्षमता, स्वास्थ्य और पारिवारिक परंपरा के अनुसार तय कर सकता है।
फलाहार करने वाले श्रद्धालु सामान्यतः फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना, सिंघाड़े का आटा और कुछ अन्य व्रत योग्य खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं। हालांकि अलग-अलग परंपराओं में व्रत के नियम अलग हो सकते हैं।
स्वास्थ्य संबंधी सावधानी - लंबे या कठोर उपवास से पहले अपनी स्वास्थ्य स्थिति और चिकित्सकीय सलाह का ध्यान रखें। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं या किसी बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को व्रत के नियम अपनी स्थिति के अनुसार रखने चाहिए।
देवउठनी एकादशी पर क्या नहीं करना चाहिए?
- एकादशी के दिन अनाज और चावल का सेवन करने से बचने की परंपरा है।
- क्रोध, झूठ, अपशब्द और अनावश्यक विवाद से दूर रहने का प्रयास करें।
- पूजा के दौरान भगवान विष्णु को तुलसी अर्पित करना शुभ माना जाता है।
- अत्यधिक तामसिक भोजन से बचना चाहिए।
- पारण निर्धारित द्वादशी समय में ही करने की कोशिश करें।
देवउठनी एकादशी की कथा
देवउठनी एकादशी से जुड़ी अनेक धार्मिक कथाएं और लोक परंपराएं प्रचलित हैं। एकादशी की महिमा का वर्णन विभिन्न धार्मिक ग्रंथों और पुराणिक परंपराओं में मिलता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान विष्णु आषाढ़ शुक्ल एकादशी से क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। यह अवधि चातुर्मास के रूप में जानी जाती है। कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन भगवान विष्णु के जागने की मान्यता के कारण इस दिन को देवउठनी या प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है।
इसी प्रसंग को भगवान विष्णु के जागरण और धर्म तथा मांगलिक कार्यों के पुनः आरंभ से जोड़कर देखा जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में इस अवसर पर अलग-अलग लोककथाएं और पूजा परंपराएं भी प्रचलित हैं।
देवउठनी एकादशी के आसपास कई क्षेत्रों में तुलसी विवाह आयोजित किया जाता है। इसमें माता तुलसी और भगवान शालिग्राम के प्रतीकात्मक विवाह की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह आयोजन वैवाहिक सुख, समृद्धि और मंगलकामना से जुड़ा हुआ माना जाता है।
कुछ स्थानों पर तुलसी विवाह एकादशी के दिन, जबकि कुछ परंपराओं में द्वादशी अथवा उसके आसपास किया जाता है। इसलिए स्थानीय परंपरा और पंचांग का पालन करना उचित है।
देवउठनी एकादशी पर दान का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी के दिन जरूरतमंदों की सहायता करना और सामर्थ्य के अनुसार दान करना पुण्यकारी माना जाता है। वस्त्र, अन्न, फल, दीपक या अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान अपनी क्षमता के अनुसार किया जा सकता है।
दान का उद्देश्य केवल धार्मिक पुण्य प्राप्त करना ही नहीं, बल्कि जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करना भी होना चाहिए।
देवउठनी एकादशी के दिन किन बातों का ध्यान रखें?
- व्रत रखने से पहले अपनी स्वास्थ्य क्षमता का ध्यान रखें।
- पूजा में दिखावे के बजाय श्रद्धा और सात्विकता को प्राथमिकता दें।
- एकादशी और पारण का समय स्थानीय पंचांग से जांच लें।
- व्रत के दौरान भगवान विष्णु का नाम स्मरण और धार्मिक पाठ कर सकते हैं।
- पारण में जल्दबाजी न करें और द्वादशी के उचित समय का ध्यान रखें।
देवउठनी एकादशी 2026 - अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
देवउठनी एकादशी 2026 कब है?
देवउठनी एकादशी 2026 का व्रत 20 नवंबर 2026, शुक्रवार को रखा जाएगा।
देवउठनी एकादशी 2026 की एकादशी तिथि कब शुरू होगी?
एकादशी तिथि 20 नवंबर 2026 को सुबह 7:15 बजे शुरू होगी।
देवउठनी एकादशी की तिथि कब समाप्त होगी?
एकादशी तिथि 21 नवंबर 2026 को सुबह 6:31 बजे समाप्त होगी।
देवउठनी एकादशी का पारण कब होगा?
देवउठनी एकादशी का पारण 21 नवंबर 2026 को द्वादशी तिथि में किया जाएगा। पारण का सटीक समय शहर के अनुसार बदल सकता है।
क्या देवउठनी एकादशी के दिन चावल खा सकते हैं?
एकादशी व्रत की सामान्य धार्मिक परंपरा में चावल और अनाज का सेवन नहीं किया जाता। हालांकि परिवार और संप्रदाय के अनुसार नियमों में अंतर हो सकता है।
देवउठनी एकादशी के दिन किस भगवान की पूजा की जाती है?
इस दिन मुख्य रूप से भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। तुलसी पूजा की परंपरा भी कई स्थानों पर प्रचलित है।

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