धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जीवितपुत्रिका (जिसे स्थानीय भाषा में जिउतिया या जितिया भी कहा जाता है) का पावन व्रत रखा जाता है। यह व्रत माताएं अपनी संतान की दीर्घायु, निरोगी काया, सुरक्षा और उज्ज्वल भविष्य की कामना के लिए रखती हैं।
जीवितपुत्रिका (जिउतिया) व्रत कथा (Jivitputrika Jiutitya Vrat Katha Complete)
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जीवितपुत्रिका व्रत से जुड़ी दो मुख्य प्रामाणिक कथाएं प्रचलित हैं:
प्रथम कथा: राजा जीमूतवाहन, चील और सियारिन की कथा
गंधर्वों के राजा जीमूतवाहन अत्यंत दयालु, धर्मपरायण और परोपकारी थे। वे राजपाठ अपने भाइयों को सौंपकर वन में पिता की सेवा करने चले गए। वन में भ्रमण करते हुए एक दिन उनकी भेंट एक वृद्ध नाग माता से हुई, जो अत्यंत दुखी होकर रो रही थी।
राजा जीमूतवाहन ने उनके दुख का कारण पूछा। नाग माता ने बताया कि पक्षीराज गरुड़ से हुए समझौते के अनुसार प्रतिदिन एक नाग गरुड़ का भोजन बनने के लिए जाता है और आज उनके इकलौते पुत्र शंखचूड़ की बारी है।
राजा जीमूतवाहन ने नाग माता को ढांढस बंधाया और कहा कि वे उनके पुत्र के प्राणों की रक्षा करेंगे। जीमूतवाहन स्वयं लाल कपड़े से ढंककर वध-शिला पर शंखचूड़ के स्थान पर लेट गए। गरुड़ जी आए और अपनी चोंच से जीमूतवाहन को उठाकर पहाड़ की चोटी पर ले गए। जब गरुड़ ने देखा कि उनके शिकार ने कोई चीख-पुकार नहीं की और वह धैर्यपूर्वक प्राण त्यागने को तैयार है, तो गरुड़ जी चकित रह गए।
गरुड़ जी ने अपना वास्तविक रूप प्रकट कर राजा से उनका परिचय पूछा। जीमूतवाहन ने पूरा सत्य बता दिया। जीमूतवाहन की परोपकार भावना और साहस से गरुड़ जी अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने जीमूतवाहन को जीवनदान दिया और आगे से किसी भी नाग का शिकार न करने का वचन दिया। इस प्रकार राजा जीमूतवाहन के साहस से नाग वंश की रक्षा हुई और शंखचूड़ को जीवन मिला। तभी से जीमूतवाहन देव की पूजा संतान रक्षक के रूप में की जाने लगी।
इसी कथा के साथ चील और सियारिन की कथा भी जुड़ी है। एक वन में पाकर के पेड़ पर एक चील रहती थी और उसी पेड़ के नीचे एक सियारिन रहती थी। दोनों में गहरी मित्रता थी। एक बार दोनों ने नगर की स्त्रियों को जीवितपुत्रिका का व्रत करते देखा और स्वयं भी यह व्रत रखने का निश्चय किया।
दोनों ने निर्जला व्रत रखा। परंतु रात में सियारिन को बहुत तेज भूख लगी और वह भूख सहन न कर सकी। उसने चुपके से श्मशान में जाकर मांस और हड्डियां खा लीं, जिससे उसका व्रत भंग हो गया। दूसरी ओर चील ने अत्यंत संयम और श्रद्धा के साथ पूरे नियम से निर्जला व्रत पूरा किया।
अगले जन्म में दोनों ने एक ही राजा के घर में दो बहनों के रूप में जन्म लिया। चील 'बड़ी बहन' (शीलवती) बनी और सियारिन 'छोटी बहन' (कपूरती) बनी। शीलवती का विवाह राजा से और कपूरती का विवाह मंत्री से हुआ। व्रत के प्रभाव से शीलवती के सभी सात पुत्र सुंदर, दीर्घायु और पराक्रमी हुए, जबकि कपूरती के जो भी पुत्र होते, वे शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते थे।
कपूरती अपनी बहन शीलवती से ईर्ष्या करने लगी। उसने कई बार शीलवती के पुत्रों को नुकसान पहुँचाने का प्रयास किया, परंतु जीमूतवाहन देव की कृपा और पूर्वजन्म के निष्ठापूर्वक किए गए जिउतिया व्रत के प्रभाव से शीलवती के पुत्रों का बाल भी बांका न हुआ। अंततः शीलवती ने अपनी बहन को पूर्वजन्म के व्रत का रहस्य बताया। कपूरती को अपनी भूल का अहसास हुआ और उसने पश्चाताप किया।
द्वितीय कथा: महाभारत कालीन अभिमन्यु पुत्र परीक्षित की कथा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत का संबंध महाभारत के युद्ध से भी है। महाभारत युद्ध के अंत में अपने पिता द्रोणाचार्य की मृत्यु का बदला लेने के लिए अश्वत्थामा ने पांडवों के शिविर पर रात में हमला किया। उसने धोखे से द्रौपदी के पांचों पुत्रों का वध कर दिया। इसके बाद भी जब अश्वत्थामा का क्रोध शांत नहीं हुआ, तो उसने पांडवों के वंश को समाप्त करने के लिए उत्तरा के गर्भ में पल रहे बालक पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया।
ब्रह्मास्त्र के प्रभाव से उत्तरा का गर्भ नष्ट हो गया। तब भगवान श्री कृष्ण ने अपने समस्त पुण्यों और योगशक्ति का प्रयोग करके उत्तरा के गर्भ में मृत पड़े बालक को पुनः जीवित कर दिया। गर्भ में ही जीवनदान पाने के कारण इस बालक का नाम 'परीक्षित' और 'जीवितपुत्रिका' पड़ा। जिस दिन भगवान कृष्ण ने बालक को जीवनदान दिया, वह आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि थी। तभी से संतान की दीर्घायु के लिए जीवितपुत्रिका (जिउतिया) व्रत की परंपरा आरंभ हुई।
जीवितपुत्रिका (जिउतिया) व्रत का महत्व (Vrat Mahatva)
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जीवितपुत्रिका व्रत का अनुष्ठान करने से माताओं को मानसिक शक्ति और संतान को सुरक्षा कवच प्राप्त होता है। इसके मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं:
- मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से संतान पर आने वाले बड़े से बड़े संकट टल जाते हैं और उसे लंबी आयु प्राप्त होती है।
- जीमूतवाहन देव की अनुकंपा से संतान की असमय मृत्यु से रक्षा होती है तथा कुल में वंश वृद्धि होती है।
- निसंतान दंपत्तियों द्वारा पूरी श्रद्धा से यह व्रत करने पर उन्हें योग्य संतान की प्राप्ति होती है।
- जीवितपुत्रिका व्रत को अत्यंत कठोर माना गया है। इसका निष्ठापूर्वक पालन करने से माताओं को समस्त पापों से मुक्ति और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।
जीवितपुत्रिका व्रत के मुख्य नियम और पारण (Rules & Fasting Food)
जीवितपुत्रिका व्रत तीन दिनों तक चलने वाला एक अत्यंत कठिन अनुष्ठान है। प्रामाणिक मान्यताओं के अनुसार इसके मुख्य नियम इस प्रकार हैं:
- पहला दिन (नहाय-खाय): आश्विन कृष्ण सप्तमी के दिन माताएं स्नान करके केवल शुद्ध व सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। बिहार और पूर्वांचल की परंपराओं के अनुसार इस दिन नोनी का साग, मडुआ की रोटी और तोरई की सब्जी खाई जाती है।
- दूसरा दिन (निर्जला व्रत): अष्टमी तिथि को माताएं पूरे दिन और पूरी रात बिना अन्न-जल ग्रहण किए निर्जला व्रत रखती हैं।
- तीसरा दिन (पारण): नवमी तिथि के दिन सूर्योदय के बाद विधि-विधान से पारण करके व्रत को पूर्ण किया जाता है।
- नमक व लहसुन-प्याज का परहेज: नहाय-खाय के बाद से व्रत समाप्ति तक लहसुन, प्याज या किसी भी तामसिक वस्तु का प्रयोग पूरी तरह वर्जित रहता है।
जीवितपुत्रिका व्रत पूजा विधि (Puja Vidhi)
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अष्टमी तिथि को संध्याकाल में जीवितपुत्रिका पूजन अत्यंत फलदायी माना गया है। पूजन की क्रमबद्ध विधि इस प्रकार है:
- अष्टमी के दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और राजा जीमूतवाहन, चील तथा सियारिन का ध्यान करते हुए निर्जला व्रत का संकल्प लें।
- घर के आंगन या पूजा कक्ष में गोबर से लीपकर पवित्र स्थान बनाएं। वहां एक छोटा जलाशय या कुंड बनाएं (या प्रतीक रूप में जल का पात्र रखें)। कुंड के पास पाकर (पाकड़) की डाल स्थापित करें।
- मिट्टी या कुश से भगवान जीमूतवाहन की प्रतिमा बनाएं। इसके साथ ही मिट्टी से चील और सियारिन की प्रतिमाएं बनाकर जल कुंड के किनारे स्थापित करें।
- जीमूतवाहन देव को चंदन, अक्षत, लाल पुष्प, धूप, दीप और वस्त्र अर्पित करें। चील और सियारिन को सिंदूर, खली और तेल अर्पित करें।
- भगवान को खीरा, अंकुरित चने, फल, मिठाई और विशेष रूप से लाल धागे में बना 'जिउतिया' (धागा या लॉकेट) अर्पित करें।
- हाथ में अक्षत व पुष्प लेकर जीवितपुत्रिका व्रत कथा का ध्यानपूर्वक पठन या श्रवण करें। कथा समाप्त होने पर आरती करें और अपनी संतान की सुरक्षा हेतु प्रार्थना करें। पूजा के बाद जिउतिया धागे को माताएं अपने गले में धारण करती हैं।
धार्मिक मान्यताएं एवं व्रत के लाभ (Beliefs & Benefits)
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जीवितपुत्रिका व्रत रखने वाली माताओं की संतान पर कभी कोई बड़ा संकट नहीं आता। इस व्रत के प्रमुख लाभ निम्नलिखित हैं:
- संतान को अकाल मृत्यु, गंभीर बीमारियों और दुर्घटनाओं से सुरक्षा मिलती है।
- पारिवारिक जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है।
- संतान का मन पढ़ाई और सत्कर्मों में लगता है तथा उसे समाज में मान-प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।
जीवितपुत्रिका व्रत उद्यापन विधि (Udyapan Vidhi)
सामान्यतः जीवितपुत्रिका व्रत जीवनभर या जब तक शरीर समर्थ हो, तब तक रखा जाता है। किंतु यदि कोई महिला स्वास्थ्य कारणों से इसका उद्यापन करना चाहती है, तो धार्मिक मान्यताओं के अनुसार निम्नलिखित विधि अपनाई जाती है:
- उद्यापन के दिन किसी शुभ मुहूर्त में पंडित जी को बुलाकर हवन व पूजन करवाएं।
- भगवान जीमूतवाहन का विधिवत पूजन करके उन्हें वस्त्र, फल, और सुहाग सामग्री अर्पित करें।
- आठ या बारह सुहागिन महिलाओं को भोजन कराएं और उन्हें जिउतिया का धागा, वस्त्र, फल तथा दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद लें।
- गौमाता और पक्षियों (चील के प्रतीक) को अन्न-जल अर्पित करें।
महत्वपूर्ण सावधानियां (Important Precautions)
- निर्जला नियम - यह व्रत पूर्णतः निर्जला रखा जाता है। व्रत के दौरान जल की एक बूंद भी ग्रहण न करें।
- संयम व सात्विकता - व्रत के दिन क्रोध, चुगली या किसी का अपमान करने से बचें। मन में सात्विक विचार रखें।
- सूतक काल - यदि परिवार में सूतक (जन्म या मृत्यु का अशौच) हो, तो महिलाएं स्वयं पूजा न करें, परंतु व्रत के नियमों का मानसिक रूप से पालन कर सकती हैं।
- पारण का समय - पारण हमेशा अष्टमी तिथि समाप्त होने के बाद नवमी तिथि में सूर्योदय के पश्चात ही करें। असमय पारण से व्रत का फल निष्फल हो सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1: जीवितपुत्रिका (जिउतिया) व्रत कब रखा जाता है?
उत्तर: यह व्रत आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है।
Q2: जिउतिया व्रत किसके लिए रखा जाता है?
उत्तर: यह व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुरक्षा के लिए रखती हैं।
Q3: क्या जिउतिया व्रत में पानी पी सकते हैं?
उत्तर: जी नहीं, धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जिउतिया व्रत पूरी तरह निर्जला रखा जाता है। इसमें जल ग्रहण करना वर्जित है।
Q4: जीवितपुत्रिका व्रत कितने दिनों का होता है?
उत्तर: यह व्रत मुख्य रूप से तीन दिनों का होता है - पहला दिन नहाय-खाय, दूसरा दिन निर्जला व्रत, और तीसरा दिन पारण।
Q5: नहाय-खाय के दिन क्या खाया जाता है?
उत्तर: स्थानीय परंपराओं के अनुसार नहाय-खाय के दिन नोनी का साग, मडुआ की रोटी, तोरई की सब्जी और सात्विक भोजन ग्रहण किया जाता है।
Q6: जिउतिया व्रत में किसकी पूजा की जाती है?
उत्तर: इस व्रत में राजा जीमूतवाहन, चील और सियारिन की मिट्टी की मूर्तियां बनाकर पूजा की जाती है।
Q7: जिउतिया का धागा कब पहना जाता है?
उत्तर: पूजा के समय लाल या पीले धागे से बना जिउतिया भगवान जीमूतवाहन को अर्पित किया जाता है और कथा के बाद माताएं इसे अपने गले में धारण करती हैं।
Q8: क्या गर्भवती महिलाएं यह व्रत रख सकती हैं?
उत्तर: निर्जला होने के कारण गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए फलाहार या चिकित्सीय सलाह के अनुसार ही नियम का पालन करना चाहिए।
Q9: जिउतिया व्रत का पारण कब और कैसे करें?
उत्तर: नवमी तिथि में सूर्योदय के पश्चात पूजा करके, नोनी का साग, मडुआ या अंकुरित अनाज खाकर व्रत का पारण किया जाता है।
Q10: यदि निर्जला व्रत के दौरान गलती से पानी पी लें तो क्या करें?
उत्तर: अनजाने में हुई भूल के लिए भगवान जीमूतवाहन से क्षमा प्रार्थना करें और व्रत को पूरा करें।
Q11: क्या नई शादीशुदा महिलाएं पहली बार यह व्रत शुरू कर सकती हैं?
उत्तर: जी हां, संतान प्राप्ति या संतान की सुरक्षा की कामना से महिलाएं शादी के बाद यह व्रत शुरू कर सकती हैं।
Q12: इस व्रत में चील और सियारिन की पूजा क्यों की जाती है?
उत्तर: चील ने पूर्ण निष्ठा से व्रत रखा था जबकि सियारिन का व्रत भंग हो गया था। चील के व्रत निष्ठा के सम्मान और सियारिन के कथा प्रसंग की स्मृति में दोनों की पूजा की जाती है।
Q13: जिउतिया व्रत की मुख्य कथा का संबंध किस महाभारत पात्र से है?
उत्तर: इस कथा का संबंध अभिमन्यु के पुत्र राजा परीक्षित और भगवान श्री कृष्ण द्वारा उन्हें गर्भ में जीवनदान देने से है।
Q14: क्या जिउतिया का धागा साल भर पहना जा सकता है?
उत्तर: जी हां, कई महिलाएं जिउतिया का धागा साल भर पहनती हैं या फिर उसे सुरक्षित स्थान पर रखकर केवल पूजा के मौकों पर पहनती हैं।

0 Comments